Tuesday, December 3, 2024

"कुछ पंक्तियाँ.."

 [१]

खुली किताब की तरह है जीवन मेरा। 

मोबाइल भी तो लॉक नहीं रहता मेरा। 

[२]

हमने तो बस स्टेटस ही बदले। 

और उसने बदल लिए रास्ते।

 

Saturday, November 30, 2024

शीर्षक: "स्वेटर"

माँ, तुम कहाँ हो ?
मैं जानता हूँ आप,
कई वर्ष पूर्व,
हम सबसे,
बहुत दूर चले गए हो।
सर्दियों का मौसम,
अब आने लगा है।
थोड़ा बीमार भी रहता हूँ,
और ठण्ड भी,
कुछ ज़्यादा ही लगती है। 
आपका आशीर्वाद और,
दवाइयों का डिब्बा,
मेरे साथ साथ चलता है। 
तुम तो सब जानती हो माँ,
मुझे बाजार की चीजें पसंद नहीं,
रेडीमेड गर्म कपड़ों में भी,
वो बात नहीं आती है। 
चाहे सपनों में ही आ जाना,
अपने हाथों से मेरे लिए,
एक "स्वेटर" बुन जाना।
#poet_shalabh_gupta ✍️


Thursday, November 21, 2024

"मेरी घड़ी"

वैसे तो मैं,
समय की,
बहुत कद्र करता हूँ। 
हर दिन हाथ में,
घड़ी पहनकर ही निकलता हूँ। 
घड़ी का समय भी,
ठीक ही रखता हूँ। 
फिर भी, 
ना जाने क्यों ?
कुछ दिनों में,
मेरी घड़ी का समय,
५ -१०  मिनट पीछे हो जाता है। 
फिर धीरे धीरे ,
और पीछे होने लगता है। 
ना जाने क्यों ? 
यूँ तो कई बार,
घड़ीसाज को,
अपनी घड़ी मैंने,
दिखाई भी थी। 
परन्तु उसको,
कोई कमी नज़र,
नहीं आई थी। 
सच कहूं तो,
"समय" के साथ मेरी,
 कभी बनी नहीं।
"समय" के साथ,
कभी नहीं चल पाया मैं। 
शायद ही कभी "समय" ने 
मेरा साथ दिया हो। 
मुझे याद नहीं। 
ना जाने क्यों ?
समय का साथ,
निभाना हो,
या किसी के साथ चलना हो,
हमेशा,
देर होती रही मुझसे। 
मोड़ थे बहुत,
और संकरे थे रास्ते। 
और मैं,
अकेले ही,
ज़िन्दगी का सफर,
तय करता रहा। 


(शेष फिर कभी )

Tuesday, November 19, 2024

"अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस"

हमारा क्या है साहब ,
हम तो बस पुरुष हैं। 
अरे कौन मनाता है,
हमारा दिन ?
कोई नहीं मनाता,
हमारा दिन। 
क्या हमारा भी, 
कोई दिन होता है।
अरे हमें तो,
अपनी पसंद के,
कपड़ें पहनने का भी,
अधिकार नहीं। 
हम तो,
खुद भी नहीं मनाते हैं। 
आप तो सब जानते हैं,
गरीब का
कोई दिन नहीं होता। 
हमारा दिन क्या मनाना ?
और कौन हमें मनाता है। 
मनाना तो छोड़िये जनाब,
अरे हमें तो,
रूठने का भी,
अधिकार नहीं। 

(अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस १९ नवंबर पर रचित कविता)

Saturday, November 16, 2024

"नई कविता"

वक्त की आपा धापी में,
जब नई कवितायेँ,
नहीं लिख पाता हूँ मैं। 
तब कमरे के कोने में लगी,
कानिस पर रखी हुई,
पुरानी कविताओं की,
डायरी पर जमी,
धूल की परतों को,
फिर से साफ करके,
उसी जगह रख देता हूँ मैं। 
और इस तरह,
बिना लिखे ही,
डायरी के बचे हुए,
कुछ कोरे पन्नों पर,
फिर से एक नई कविता,
लिख देता हूँ मैं। 

Tuesday, June 18, 2024

"मरुस्थल.."

बातों ही बातों के,
फूल खिलते थे जहाँ। 
खामोशियों के मरुस्थल,
रह गए अब वहाँ। 

Tuesday, May 21, 2024

"माँ .."

सुकून से सो जाते हैं, 
बच्चे रात में,
माँ का लोरी सुनाना, 
बहुत ज़रूरी है। 
संवर जाती है, 
जिंदगी बच्चों की,
घर में एक माँ, 
बहुत ज़रूरी है। 

(अंतरराष्ट्रीय मदर्स डे पर विशेष)

Friday, May 10, 2024

"मेहंदी.."

मेहंदी उसने हाथों में लगाई है,
और निखरे - निखरे हम हैं। 
फूल उसने गेसूओं में लगाए हैं,
और महके - महके हम हैं। 

Monday, March 25, 2024

"रंग कच्चे सारे.."

नकली बाज़ार के रंग कच्चे सारे,
फूल टेसू के अब कहाँ खिलते हैं। 
रंग से जो मन को इस दुनिया  में,
ऐसे लोग हमें अब कहाँ मिलते हैं। 

Monday, February 19, 2024

"संविदा.."

ज़िन्दगी की,
नौकरी में,
कुछ दर्द,
संविदा पर,
मिले थे मुझे। 
कुछ इस तरह,
मेरा साथ, 
भाने लगा उन्हें। 
धीरे धीरे,
वो दर्द सारे,
permanent हो गए। 
और छोड़कर अब,
जीते नहीं मुझे।