यह बात तब और भी जरूरी हो जाती है जब हम अकेलें रहतें हों। सारे decisions ख़ुद ही लेने हों। फिर परिणाम चाहे कुछ भी हो।
Abhimannu भी चक्रव्यहू से निकलने का रास्ता नहीं जानते थे, लेकिन वह फिर भी परिणाम की चिंता किए बिना चक्रव्यहू में गए थे।
किनारे पर बैठ कर तो हम तैरना नहीं सीख सकते हैं, लहरों का सामना तो करना ही होगा। डूब जाने के डर से तो हम कभी तैरना नहीं सीख पायेंगें ।
अगर ज़िन्दगी को सही अर्थों में जीना है तब, इतना risk तो लेना ही होगा। चक्रव्यहू में तो जाना ही होगा।
बस, हौसला नहीं खोना है। हिम्मत नहीं हारनी है। लगातार प्रयास करते रहना है। फिर देखना , एक दिन सफलता जरूर हमारे साथ होगी।
शलभ गुप्ता



