
मेरी जिंदगी तूने मुझे , बहुत आजमाया है।
सिर्फ़ खोया ही है आज तक “राज ” ने ,
नही कुछ पाया है।
लौट गई खुशियाँ बीच राह में से ही,
मील के पत्थरों ने आंसुओं से भीगा हुआ ,
यह संदेशा भिजवाया है।
अब न कभी आयेंगीं बहारें ,
चमन की डालियों ने , सिसकते हुए यह बताया है ।
बरसात के मौसम में भी न बरसेंगें बादल,
तपती धरती ने हर बार की तरह ,
फिर अपने दिल को समझाया है ।
बर्फ कैसे गिरेगी मेरी घर की छत पर ,
आग के शोलों पर , जब हमने घर बनाया है ।
क्यों आ जाते हम हर किसी की बातों में ,
गैरों से ज्यादा हमें , अपनों ने रुलाया है।”







