Thursday, February 6, 2014

" राहें..."

ज़िन्दगी के घुमावदार रास्तों ,
संकरे मोड़ों के गुज़र जाने के बाद ,
दिखाई देने लगती हैं हमको ,
बड़ी-बड़ी और खुली राहें।

Wednesday, February 5, 2014

"दिल के दर्द.."

एक बार कहा था किसी ने  “बोलती हैं तस्वीरें”,
आज महसूस हुआ सच बोलती है तस्वीरें,
बिना कुछ कहे सब कुछ कह जाती है तस्वीरें ..
दिल के दर्द को आखों से बयां कर जाती हैं तस्वीरें 
- शलभ गुप्ता "राज"

Tuesday, February 4, 2014

"बसंत पंचमी...."

शब्दों का अतुल भण्डार दो माँ, हृदय को नये विचार दो माँ। इतना मुझ पर उपकार करो माँ। जीवन मेरा संवार दो माँ। अनुभूतियों को साकार दो माँ।
सृजन को व्यापक स्वरुप दो माँ। श्वेत पृष्ठों को इंद्रधनुषी कर दूँ, मेरे शब्दों को नये रंग दे दो माँ। "शलभ" को नये आयाम दो माँ। शब्दों का मुझे उपहार दो माँ। कुछ ऐसा लिखे मेरी लेखनी, पढ़कर सब निहाल हो जाएँ माँ।


तस्वीर- साभार गूगल


Monday, January 27, 2014

"अजनबी शहर था..."

अजनबी शहर था,
कब हो गया अपना पता ही ना चला।
एक फूल गुलाब का चाहा था,
कब बागवाँ हो गया अपना पता ही ना चला।
कल रात घनघोर थी बारिश, 
कहीं कुछ दिखता ना था।
किस ओर जाऊं मैं सोच ही रहा था।
कब थाम लिया उसने, 
मेरा हाथ आकर पता ही ना चला।
कुछ वर्षों से मेरी कविताओं को शब्द मिलते ना थे,
एक-दो पंक्तियों से आगे हम लिखते ना थे।
कब बन गई एक नई कहानी पता ही ना चला ।
( शलभ गुप्ता "राज")

Friday, January 17, 2014

"गुनगुनी धूप...."

मेरे बस में हो अगर,
कोहरे से भरे इन जाड़ों के मौसम में,
अपने शहर के लिए,
यहाँ से कुछ "गुनगुनी धूप" भेज दूँ !
( शलभ गुप्ता "राज")
- मुम्बई ( महाराष्ट्र )

Monday, January 13, 2014

"चलो, आज फिर मैं पतंग उडाऊं...."

चलो, आज फिर मैं पतंग उडाऊं ।
कुछ देर के लिये बचपन में लौट जाऊं ।
ज़िन्दगी के घटते हुए पलों को भूलकर,
गुज़रे हुए पलों को जोड़ लाऊं।
यूँ तो बहुत चंचल थी बचपन की हवायें
फिर भी बड़ा अदब करती थी हवायें।
नज़रों से ही बात समझ लेती थीं ,
तेज़ हवाओं में भी पतंगें डोर से बंधी रहतीं थीं।
अब ना वो पतंगें हैं ना वो हवायें हैं।
बहुत बे-अदब आज की हवायें हैं।
समझ कर भी बात नहीं समझतीं हैं।
एक हवा के झोके से ही पतंगें,
डोर से टूट जाया करती हैं ।
अनेकों रंगों में आज उड़ रही पतंगें।
बहुत बे-रंग हो रही आज पतंगें।
कहाँ से कहाँ आ गयीं सिरफिरी हवाओं संग ये पतंगें।
अपनी धरती अपना आकाश मांग रही पतंगें,
आज "केसरिया" और "हरी" हो रही पतंगें।
कैसे , आज फिर में दिल को अपने समझाऊं ?
इन हवाओं में, कैसे मैं पतंग उडाऊं ।

Monday, January 6, 2014

"कबीरमय ..."

आजकल कबीरमय हो गयी है ज़िन्दगी,
ढाई आखर के प्रेम में खो गयी है ज़िन्दगी ...

"कबीर महोत्सव मुम्बई - 2014 "

Saturday, December 28, 2013

"मन की तितलियों को उड़ने दिया करो .."



कभी-कभी अपने दिल की भी सुना करो ।
 मन की तितलियों को उड़ने दिया करो ।
ये माना काम में बहुत मसरूफ हो मगर,
कभी-कभी कुछ लम्हे खुद को भी दिया करो ।
बारिशों के मौसम में भी भीगा करो।
उदास ज़िन्दगी में इन्द्रधनुषी रंग भरा करो ।
कभी-कभी खुल कर भी हँसा करो ।
तितलियों को किताबों में मत रखा करो।
उनके संग-संग आसमां में उड़ा करो।
कभी-कभी अपने दिल की भी सुना करो।
( Shalabh Gupta "Raj")

Thursday, December 26, 2013

"कुछ दूर तलक साथ चलो,..."


"कुछ कह रहे हैं हमसे.....
काटों संग यह फूल खिले ।
कुछ दूर तलक साथ चलो,
भूल कर शिकवे-गिले।
जब साथ चलोगे,
तो कुछ बात भी होगी।
दूर है बहुत मंजिल ,
राह आसान भी होगी ।
धीरे-धीरे मिट ही जायेंगे,
मन के यह फासले ....
कुछ दूर तलक साथ चलो,
भूल कर शिकवे-गिले।

Thursday, December 12, 2013

"तब गीत मेरे गुनगुनायेंगे लोग..."

कोई किसी को याद नहीं करेगा , 
यह ग़लत कहते है लोग।
ज़िन्दगी भर याद आयेगें , 
मुझे आप सब लोग।
शायद मुझे भी याद करेंगे , 
मेरे जाने के बाद "कुछ" लोग।
जब खामोश हो जाऊंगा मै , 
तब गीत मेरे गुनगुनायेंगे लोग।
चला जाऊंगा इस शहर से जब मै, 
मेरे कदमों के निशान ढूढेंगे लोग। 
मैं हूँ एक पेड़ चंदन का,
इसलिए मेरे करीब नहीं आते है लोग।
पत्थर पर घिस कर जब फना जाऊंगा मै,
तब मुझे माथे पर लगायेंगे लोग।
आसमान से टूटता हुआ तारा हूँ,
एक दिन टूट जाऊंगा मै ।
खुशी बहुत है इस बात की "राज" को मगर
देखकर मुझे अपनी मुरादें पूरी कर लेंगे लोग।

( Shalabh Gupta "Raj")