Saturday, June 6, 2015

"जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई"..




















"एक बार फिर से दीजिये,  एक- दूसरे को बधाई।
खुशियों  की सौगात लिये  6 जून की सुबह आई।
सूरज की किरणों ने, प्रेषित  की पहली बधाई।
फिर चिड़ियाँ चहचहायी, "जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई"!
सागर की लहरों ने प्रेषित की दूसरी बधाई।
फिर हवा गुनगुनाई, "जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई"!
एक बार फिर से दीजिये,  एक- दूसरे को बधाई।
खुशियों  की सौगात  लिये  6 जून की सुबह आई।
बधाईयों  के सिलसिले यूँ ही अनवरत चलते रहें,
हम आपको और आप  हमें यूँ ही याद करते रहें।
हज़ारों लोग मिले , मौज़ों की रवानी में ,
तुम ही बस याद रहे , ज़िन्दगी की कहानी में।
ज़िन्दगी से खुश होकर गले मिले , जाते हुये लम्हे।
आते हुये लम्हों ने कहा, "जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई"!
एक बार फिर से दीजिये,  एक- दूसरे को बधाई।
खुशियों  की सौगात लिये 6 जून की सुबह आई।"
- शलभ गुप्ता "राज"


Monday, June 1, 2015

"अमलतास"

अमलतास के फूल हैं यह,

शायद कुछ कह रहे हैं,

कुछ सुना आपने ,

क्या  वही ?

अभी-अभी जो सुना है मैंने,

शायद वही !


Friday, May 8, 2015

"अपनी आखों में हजारों समुन्दर ले आये हम .."

जिस समुन्दर को रोज देखा करते थे हम ।
लहरों से खूब बातें किया करते थे हम ।
अब उन किनारों को दूर छोड़ आये हम ।
अपनी आखों में हजारों समुन्दर ले आये हम ।
दिल में आता हैं , सब कुछ भूल जाएँ हम ।
ना किसी को याद करें, ना किसी को याद आयें हम ।
मगर इन "यादों" को कहाँ ले जाएँ हम ।
अपनी आखों में हजारों समुन्दर ले आये हम ।
"यादें" सहारा होती है जीवन का ,
मेरे साथ रहती हैं हमेशा "यादें" और "हम" ।
पहले भी तन्हा थे और आज भी तन्हा हैं हम ।
अपनी आखों में हजारों समुन्दर ले आये हम ।
शिकवा नहीं किसी से ना शिकायत है कोई,
चलो, कुछ लम्हों के लिए तो मुस्करा लिये हम ।
उनकी "ख़ामोशी" , सब कुछ समझ गये हम ।
अपनी आखों में हजारों समुन्दर ले आये हम ।
(Shalabh Gupta "Raj")

Saturday, April 4, 2015

"नयी शुरुआत..."

घना अँधेरा और बड़ी लम्बी रात है ।
चलो, अब कुछ लम्हों की ही तो बात है ।
खत्म हो जायेगी यह काली रात ,
एक सूर्योदय , फिर नयी शुरुआत है ।

Friday, March 20, 2015

अपने हिस्से का "दाना"....





आजकल,
चिड़ियाँ भी कम नज़र आने लगी हैं ,
मेरी छत की मुंडेर पर ।
क्या इन्हें भी पता चल गया मेरे जाने का ?
चिड़ियों, तुम चिंता मत करना ।
मैंने , बहुत सारे "अनाज के दाने "..
लाकर रख दिये हैं ,
मेरी छत पर बने एक कमरे में ।
घर में सबको कह दिया है,
और अच्छे से सबको समझा भी दिया है ।
मेरे दोनों बच्चे सुबह और शाम ,
छत की मुंडेर पर "दाना" रख दिया करेगें ।
सब कुछ तुम्हारा ही तो है ।
इन "दानों" पर हक़ तुम्हारा है ।
मैं कहीं भी रहूँ ,
तुम कभी चिंता मत करना ।
मेरी छत पर रोजाना ,
इसी तरह आते रहना ।
अपने हिस्से का "दाना",
तुम इसी तरह चुगते रहना ।

Saturday, February 21, 2015

"बेटी.."

[१]
"बेटी" सिर्फ एक शब्द नहीं,
खुशियों का पावन नाम है ।
उससे ही है पूजा-आरती,
वह घर तीरथ-धाम है ।
[२]
तुलसी का पौधा ज़रूरी नहीं,
जहाँ बेटी का जन्म हो जाता है ।
जिस घर में होती है "बेटी",
वह घर मंदिर हो जाता है । 

" बेटियाँ.."

नाज़ुक सी टहनियों पर फूलों की लड़ियाँ,
वो खिलती  कलियाँ घर में आती ढेरों खुशियाँ ,
ओंस की बूंदों जैसी होती हैं बेटियाँ ,
जीने का सबब होती हैं बेटियाँ ,
माता-पिता की अनमोल धरोहर हैं बेटियाँ ,
अपने घर में भी मेहमान होती हैं बेटियाँ ,
विदा करके उनको निभाना है दस्तूर,
फिर उम्रभर बहुत याद आती हैं बेटियाँ।  

"माँ .."

सकून से सो जाते हैं बच्चे रात भर,
माँ का लोरी सुनाना ज़रूरी है।
संवर जाती है ज़िन्दगी बच्चों को,
घर में एक माँ बहुत ज़रूरी है। 

Wednesday, February 11, 2015

एक यादगार तस्वीर..

मुरादाबाद में 8 फरवरी 2015 को आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मलेन में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शायर जनाब मंसूर उस्मानी जी, "यश- भारती" से सम्मानित कवि डॉ. विष्णु सक्सेना जी एवं संस्कार भारती-मुरादाबाद के महानगर अध्यक्ष बाबा संजीव आकांक्षी  जी के साथ.. एक यादगार तस्वीर !


Friday, September 19, 2014

"ऐ - बारिशों.."

बिन बुलाये मेहमान की तरह ,
हर रोज़ चली आती हो,
मेरी प्रिय बारिशों,
अब तो लौट जाओ जरा।

शलभ गुप्ता "राज"
मुंबई