Wednesday, July 13, 2016

"मंजिल.."

मंजिल चाहे कितनी भी दूर सही ....
क़दमों पर अपने , बस भरोसा होना चाहिए। 

ठहरे हुए पानी में क्या मज़ा आएगा,
तैरने के लिए , समुन्दर में तूफान चाहिए।
चलते रहना है निरंतर , ना रुकना है कभी ..
भीड़ से अलग, पद-चिन्ह अपने बनाना चाहिए।
(Shalabh Gupta "Raj")

"कैक्टस.."

कैक्टस में भी तो फूल मुस्कराते हैं।
ज़रा सी परेशानियों में ही लोग,
हिम्मत हार जाते हैं ।
किनारे बैठे रहने से कुछ नहीं हासिल,
विरले ही समुन्दर पार जाते हैं।
(Shalabh Gupta "Raj")

"पृथा थिएटर ग्रुप - मुंबई"

कई वर्षों से चल रहा  निरन्तर,
"पृथा थिएटर" का ये अद्धभुत सफर।
"पटकथा" की यादें हैं धरोहर,
अनुभव के नए रंग मिले,
राजा रवि वर्मा - "चित्रकार" बनकर।
बहुत डराती थी "32/13" की रातें ,
दिल को सुकून देती हैं "मरहम" की बातें।
रेनकोट और छाता छोड़ आना घर पर,
आप सबको भिगोने आये हैं,
अब हम "सावन" बन कर।

(शलभ गुप्ता "राज")
प्रोडक्शन मैनेजर
पृथा थिएटर ग्रुप- मुंबई.

Monday, April 11, 2016

"नये सफर..."

यादों के सहारे कब तक जिया जायेगा ,
चल उठ, अब फिर से जिया जायेगा।  
कल की गठरी को मन से उतार,
अब नये  सफर पर चला जायेगा।  
तमाम उम्र झुलसती रही ज़िन्दगी,
अब के बारिशों में खूब भीगा जायेगा।  
भीड़ में भी तन्हा ही चलते रहे "शलभ",
अब किसी को हमराह बनाया जायेगा।  
( शलभ गुप्ता "राज")

Tuesday, March 29, 2016

"टूटता हुआ तारा...

कोई किसी को याद नहीं करेगा ,
यह ग़लत कहते है लोग।
ज़िन्दगी भर याद आयेगें ,
मुझे आप सब लोग।
शायद मुझे भी याद करेंगे ,
मेरे जाने के बाद "कुछ" लोग।
जब खामोश हो जाऊंगा मै ,
तब गीत मेरे गुनगुनायेंगे लोग।
चला जाऊंगा इस शहर से जब मै,
मेरे कदमों के निशान ढूढेंगे लोग।
मैं हूँ एक पेड़ चंदन का,
इसलिए मेरे करीब नहीं आते है लोग।
पत्थर पर घिस कर जब फना  जाऊंगा मै,
तब मुझे माथे पर लगायेंगे लोग।
आसमान से टूटता हुआ तारा हूँ,
एक दिन टूट जाऊंगा मै ।
खुशी बहुत है इस बात की "राज" को मगर
देखकर मुझे अपनी मुरादें पूरी  कर लेंगे लोग।
(Shalabh Gupta "Raj")

Friday, February 12, 2016

"शब्दों का अतुल भण्डार दो माँ,..

शब्दों का अतुल भण्डार दो माँ,
हृदय को नये विचार दो माँ।
इतना मुझ पर उपकार करो माँ।
जीवन मेरा संवार दो माँ।
अनुभूतियों को साकार दो माँ।
सृजन को व्यापक स्वरुप दो माँ।
श्वेत पृष्ठों को इंद्रधनुषी कर दूँ,
मेरे शब्दों को नये रंग दे दो माँ।
"शलभ" को नये आयाम दो माँ।
शब्दों का मुझे उपहार दो माँ।
कुछ ऐसा लिखे मेरी लेखनी,
पढ़कर सब निहाल हो जाएँ माँ।
( Shalabh Gupta "Raj")

Tuesday, February 9, 2016

"नये सफ़र.."

"एक जोड़ी पुराने जूते हैं पास मेरे,
और एक नये सफ़र की तैयारी है।
मेरे जाने का जबसे पता चला है ,
घर में सबकी आखें भारी हैं ।
सबसे बड़ा बेटा हूँ घर का ,
अभी काम बहुत करने हैं ।
जीवन रुपी समुन्द्र में ,
सघन मंथन के बाद ही ,
तो अमृत कलश निकलने हैं । "
(Shalabh Gupta "Raj")

Sunday, February 7, 2016

"नये इन्द्रधनुष..."

आशाओं के नये इन्द्रधनुष बने,
आप सबकी दुआ रंग लायी है ,
साज के टूटे तारों को जोड़कर ,
फिर एक नयी धुन सजायी है .
(Shalabh Gupta "Raj")

Monday, February 1, 2016

"पत्थर दिल .."

अक्सर ना जाने क्या टूटता है मुझमें ,
लोग तो कहते हैं पत्थर दिल है मेरा !
(Shalabh Gupta"Raj")

Wednesday, October 14, 2015

पापा जी की घड़ी..

कई बार नयी घड़ी लाकर दी थी पापा जी नें ,
एक भी ठीक नहीं रख पाया मैं ,
क़ुछ ना जाने कहाँ खो गयीं ,
कुछ वक्त से पहले ही ठहर गयीं।
पापा जी अपनी घड़ी को बहुत ध्यान से रखते थे।
पिछले वर्ष, जब पापा जी हमसे बहुत दूर चले गये ,
उस वक्त भी उनके सिरहाने रखी ,
उनके हाथ की घड़ी ठीक चल रही थी ,
उस कठिन समय में भी सही समय बता रही थी।
मेरे पास आज भी , अपनी एक भी घड़ी नहीं है।
पापा जी की उस घड़ी को अब मैं ,
अपने हाथ में बांधने लगा हूँ।
शायद अब, समय की अहमियत समझने लगा हूँ।
@ शलभ गुप्ता "राज"