Thursday, October 6, 2016

"मुस्कान..."

प्लास्टिक की मुस्कान मिले जिन चेहरों पर,
दोस्तों उनसे मिलना ज़रा संभालकर ,
रिश्तों की अहमियत न हो जहाँ,
कीमती आंसुओं को रखना वहाँ संभालकर "

Tuesday, October 4, 2016

"कहानी आपकी.."

चेहरे की उड़ी- उड़ी रंगत , कह रही है कहानी आपकी। बहुत मजबूर, ग़मों से चूर लग रही है सूरत आपकी। बोझिल पलकें बता रहीं हैं , कई रातों से नीदें अधूरी हैं आपकी। चेहरे की उड़ी- उड़ी रंगत , कह रही है कहानी आपकी। तितली की तरह उड़ना था आपको आकाश में एक कमरे में सिमट कर रह गई है ज़िन्दगी आपकी। कुछ ढूँढ रहीं है आपकी बैचेन निगाहें, शायद कोई चीज खो गई है आपकी। चेहरे की उड़ी- उड़ी रंगत , कह रही है कहानी आपकी। टूट कर चकना चूर हो गई , दिल के कानिस पर जो रखी थी ख्वाबों की तस्वीर आपकी। कहने को तो मुस्करा रहें हैं आप, मगर सच कहते हैं हम। पहले जैसी , वो मुस्कराहटें अब नहीं है आपकी। चेहरे की उड़ी- उड़ी रंगत , कह रही है कहानी आपकी।

Friday, September 30, 2016

"पता.."

दुनिया की खबर रखते हैं हम,
मगर अपना पता मालूम नहीं।  

Monday, September 12, 2016

"गणपति बाप्पा मोरया"

गणपति बाप्पा मोरया। 
मंगल मूर्ति मोरया।  
फोटो : गूगल से आभार।  

Saturday, August 6, 2016

"तितलियों को उड़ने दिया करो.."











तितलियों और फूलों को तुमको,
अपनी डायरी में रखना अच्छा लगता है।
मगर, यह मुझको ठीक लगता नहीं,
बंधनों में मत बांधों किसी को,
जिंदा ही मत मारो किसी को,
तितलियों को उड़ने दिया करो,
फूलों को महकने दिया करो।
क्योंकिं डायरी में रखने पर,
इन्द्रधनुषी तितलियाँ हो जाती हैं बेरंग,
फूल खो देते हैं अपनी सुगंध।
खामोश तितलियाँ , मुरझाये फूल ...
देखकर हम उदास हो जाते हैं।
चाह कर भी , हम फिर उन्हें
जीवित नहीं कर सकते ।
इसीलिए , मेरा अनुरोध स्वीकार करो,
तितलियों को उड़ने दिया करो।
फूलों को महकने दिया करो।

(शलभ गुप्ता "राज")

Sunday, July 17, 2016

"जीवन.."

यदि आँखों में किसी की,
कोई नमी नहीं हैं।
धरती उस दिल की,
फिर उपजाऊ नहीं है।
संवेदनाओं का एक भी पौधा,
अंकुरित होता नहीं जहाँ,
ऐसा बंज़र जीवन,
जीने के योग्य नहीं हैं।
(Shalabh Gupta "Raj')

Wednesday, July 13, 2016

"नये ख्वाब.."

क्या हुआ  जो एक ख्वाब है टूटा, 

कुछ नये ख्वाब मेरी आखों में हैं।

(शलभ गुप्ता - "राज")



"मंजिल.."

मंजिल चाहे कितनी भी दूर सही ....
क़दमों पर अपने , बस भरोसा होना चाहिए। 

ठहरे हुए पानी में क्या मज़ा आएगा,
तैरने के लिए , समुन्दर में तूफान चाहिए।
चलते रहना है निरंतर , ना रुकना है कभी ..
भीड़ से अलग, पद-चिन्ह अपने बनाना चाहिए।
(Shalabh Gupta "Raj")

"कैक्टस.."

कैक्टस में भी तो फूल मुस्कराते हैं।
ज़रा सी परेशानियों में ही लोग,
हिम्मत हार जाते हैं ।
किनारे बैठे रहने से कुछ नहीं हासिल,
विरले ही समुन्दर पार जाते हैं।
(Shalabh Gupta "Raj")

"पृथा थिएटर ग्रुप - मुंबई"

कई वर्षों से चल रहा  निरन्तर,
"पृथा थिएटर" का ये अद्धभुत सफर।
"पटकथा" की यादें हैं धरोहर,
अनुभव के नए रंग मिले,
राजा रवि वर्मा - "चित्रकार" बनकर।
बहुत डराती थी "32/13" की रातें ,
दिल को सुकून देती हैं "मरहम" की बातें।
रेनकोट और छाता छोड़ आना घर पर,
आप सबको भिगोने आये हैं,
अब हम "सावन" बन कर।

(शलभ गुप्ता "राज")
प्रोडक्शन मैनेजर
पृथा थिएटर ग्रुप- मुंबई.