Tuesday, July 4, 2017

"मैं ग्रीष्म हूँ .."

मैं ग्रीष्म हूँ ,
ज़रा देर से आया हूँ। 
हालातों की तेज तपन में,
बारिशों की खुशबू  लाया हूँ। 
कंकरीट के इस शहर को,
अपना बनाने आया हूँ। 
कुछ गीत नये लिखने आया हूँ। 
कुछ कवितायेँ सुनाने आया हूँ।
मैं ग्रीष्म हूँ ,
ज़रा देर से आया हूँ। 
@ शलभ गुप्ता "राज"
पृथा थिएटर , मुंबई 
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(श्रीकांत पुराणिक द्वारा निर्देशित नाटक 
"ग्रीष्म"  के लिये लिखी हुई कुछ पंक्तियाँ )
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"शलभ..."

"शलभ" नाम है मेरा,
बड़ी दूर से आया हूँ।
हालातों की तेज तपन में,
चन्दन की खुशबू  लाया हूँ।
कंकरीट के इस शहर को,
अपना बनाने आया हूँ।
कुछ गीत नये लिखने आया हूँ।
कुछ कवितायेँ सुनने आया हूँ।
@ शलभ गुप्ता "राज"

Monday, July 3, 2017

"बारिश.."

थोड़ी देर के लिए ही सही,
बारिश बन कर आ जाओ,
मेरे आँगन में।
बरस जाओ,
दिल के हर कोनों में।
महक जाओ,
घर के सारे बंद कमरों में।
@ शलभ गुप्ता "राज"
पृथा थिएटर , मुंबई 
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(श्रीकांत पुराणिक द्वारा निर्देशित नाटक 
"सावन"  के लिये लिखी हुई कुछ पंक्तियाँ )
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Wednesday, June 28, 2017

"मेरे शहर में.."

थोड़ा ही सही , शगुन तो हुआ;
मेरे शहर में , आज बारिशों का।


Sunday, June 25, 2017

"चाँद" मेरे..

आज देर से आयेगा,"चाँद" आसमान में,
"चाँद" मेरे, तुम ही जल्दी घर आ जाना !!

@ शलभ गुप्ता 

"चाँद.."

कल कह दिया था चाँद ने,
थोड़ी देर से आऊंगा आज !!

@ Shalabh Gupta

Saturday, June 24, 2017

"अजनबी के नाम.."

चर्चगेट से आती हुई,
आखिरी लोकल ट्रेन  की तरह,
खाली-खाली सी शाम हो गयी।
शोर मचातीं आतीं लहरें ,
पत्थरों से टकराकर,
गुमनाम हो गयीं।
घर के एक कोने में रखी,
रंग-बिरंगी छतरियाँ भी ;
बारिशों के ना आने से,
परेशान हो गयीं।
मिलना ना होगा जिनसे कभी,
ज़िन्दगी "शलभ" की ,
उसी अजनबी के नाम हो गयी।
@ शलभ गुप्ता "राज"

Thursday, June 22, 2017

"सौगात.."

आँसू नहीं अनमोल  मोती हैं यह, 
अपनों की दी हुई सौगात है यह।  

"बरसात.."

जब भी खुद से मुलाकात हुई ,
आंसुओं की खूब बरसात हुई। 

"तन्हाई .."

तन्हाई में भी अकेले कहाँ हम,
यादों का आंसुओं संग साथ है।