Wednesday, August 9, 2017

"दिल की बातें..."

तुम्हें तो अब शायद,
याद  भी नहीं होगा।
गहरे पीले रंग का ,
तुम्हारा एक रूमाल ,
मेरे पास रह गया था।
उसी में बांधकर रखी  हैं,
तुम्हारे संग बीते हुए ,
लम्हों की सारी यादें।
डायरी के पन्नों पर,
लिखी हैं सारी बातें।
तुम्हें तो अब शायद ,
याद  भी नहीं होगा।
तुमने जो ग्रीटिंग कार्ड्स ,
मुझको वापस भेज दिए थे,
सब संभालकर रखें है मैंने।
क्योंकि, उन लिफाफों पर;
मेरा नाम जो लिखा है,
तुमने अपने हाथों से।  
बहुत सुन्दर लिखती हो,
बिलकुल अपनी तरह।
तुम्हें तो अब शायद ,
याद  भी नहीं होगा।
© ® शलभ गुप्ता
(अभी बहुत कुछ लिखना  बाकी है ,
शेष फिर कभी लिखेंगें दिल की बातें )


"आखिर क्यों.."


हज़ारों लोग मिले ,
मौज़ों की रवानी में , 
तुम ही बस याद रहे ,
ज़िन्दगी की कहानी में।
(तस्वीर:
यादों की एक डायरी से)
ऐसा तो होता है ,
मगर ;
ऐसा आखिर क्यों होता है ?
@ शलभ गुप्ता

Tuesday, July 25, 2017

"यादें और सावन.."

छा जाओ, बरस जाओ,
दिलों में, शहर में।
कभी यादें बनकर।
कभी सावन बनकर।
@ शलभ गुप्ता 

"मैंने देखा है अक्सर.."

हाईवे से गुज़रते हुए ,
सड़क के दोनों ओर,
हरे-भरे पेड़ों के बीच,
मैंने देखा है अक्सर,
कई पेड़ सूखे हुए।
@ शलभ गुप्ता 

Monday, July 17, 2017

"हमनें देखा है अक्सर,..."

प्रेम की डगर पर,
भीड़ भरे चौराहों पर,
हमनें देखा है अक्सर,
लोगों को रास्ता बदलते हुए।  
आजकल महफिलों में,
हमनें देखा है अक्सर,
प्लास्टिक की मुस्कान लिए,
दोस्तों को बातें करते हुए।  
बड़े-बड़े शहरों की,
ऊँची-ऊँची इमारतों में,
हमनें देखा है अक्सर,
बुज़ुर्गों को गुमसुम रहते हुए। 
@ शलभ गुप्ता "राज"


Friday, July 14, 2017

"नैना .."

बोझिल पलकें, नैना हैं भारी।
जाने कहाँ गयी नींदें हमारी।
@ शलभ गुप्ता 

Wednesday, July 12, 2017

"अजनबी सी.."

हज़ार गम हैं ज़िन्दगी में,
किसी से शिकायतें क्या करो ?
दुनिया लगे जब अजनबी सी,
खुद से बातें किया करो ।
@ शलभ गुप्ता "राज"

Monday, July 10, 2017

"ये बारिशें भी प्रेमिका की तरह हैं.."

A.C. कमरों में बैठकर,
T.V. पर बारिशों का हाल देखकर,
शहर में हुए जलभराव की, 
अख़बार में छपी तस्वीरें देखकर,
कहाँ भीग पाते हैं हम।  
साल भर बारिशों का इंतज़ार ,
करते हैं.. और फिर ; 
बारिशों में भीगने से डरते हैं।  
छाता संग लेकर चलते हैं।  
हर रोज भीगना ज़रूरी नहीं,
कभी-कभी तो भीग ही सकते हैं।  
ये बारिशें भी प्रेमिका की तरह हैं,
हर रोज मिलने नहीं आती हैं।   
इसीलिए जब भी बारिशें आयें ,
जी भरकर भीगना।  
मोबाइल, घडी वगैरह ;
सब घर पर रख आना ।  
आना तो बस भीगने आना।  
@ शलभ गुप्ता "राज"

Friday, July 7, 2017

"घर के दरवाजे.."

घर की दीवारों को,
बारिशों में भीगता देखकर,
मेरे घर के दरवाजे,
आजकल बहुत उदास हैं।
@ शलभ गुप्ता "राज"

Thursday, July 6, 2017

"मैं ग्रीष्म हूँ - 2"

(श्रीकांत पुराणिक द्वारा निर्देशित नाटक
"ग्रीष्म" के लिये मेरी एक कविता )
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मैं ग्रीष्म हूँ ,
दिल की दूरियाँ मिटाने आया हूँ।
इस अजनबी शहर को,
अपना बनाने आया हूँ।
हालातों की तेज तपन में,
बारिशों की खुशबू लाया हूँ।
प्रेम के गीत सुनाने आया हूँ।
रंगमंच है ये ज़िन्दगी,
नाटक नये दिखाने आया हूँ।
@ शलभ गुप्ता "राज"
पृथा थिएटर , मुंबई
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