Thursday, September 14, 2017

"मेरी आखों पर पहरे हैं .."

तुम्हारी यादों के आंसू,
मेरी पलकों पर आकर ठहरे हैं ।
बरस नहीं सकते मगर,
मेरी आखों पर पहरे हैं ।
"राज" बहुत गहरे हैं ।
जुदा हुये थे जिस मोड़ पर,
हम आज तक वहीं ठहरे हैं ।
किस तरह याद करें तुमको,
मेरी हिचकियों पर पहरे हैं ।
"राज" बहुत गहरे हैं ।

@ शलभ गुप्ता "राज"
कुछ वर्ष पूर्व लिखी एक कविता 

Monday, September 11, 2017

"मेरी परछाई.."

अनजाने लोग, अजनबी शहर।
भूल-भूलैयाँ , प्रेम की डगर।
मेरी परछाई, मेरी हमसफ़र।

@ शलभ गुप्ता


Sunday, September 10, 2017

"B&W तस्वीर.."

B&W तस्वीर की रंगबिरंगी यादें।  
कुछ खट्टी और कुछ मीठी यादें।  

( शलभ गुप्ता )

"Happy Birthday Maa.."

Remembering you on your birthday..
(9 Sept. 2017)
Happy Birthday Maa !!
We always miss you..

Friday, September 8, 2017

"पापा जी की घड़ी.."

पापा जी की घड़ी को, अपने हाथ में बांधने लगा हूँ।
शायद अब, समय की अहमियत समझने लगा हूँ।
(शलभ गुप्ता )


Wednesday, August 23, 2017

"अपनों ने रुलाया है.."

मेरी जिंदगी तूने मुझे,
बहुत आजमाया है।
सिर्फ़ खोया ही है आज तक,
नही कुछ पाया है।
लौट गई खुशियाँ बीच राह में से ही,
मील के पत्थरों ने,
आंसुओं से भीगा हुआ ,
यह संदेशा भिजवाया है।
क्यों आ जाते हैं हम ,
हर किसी की बातों में ,
गैरों से ज्यादा हमें,
अपनों ने रुलाया है।”
(कई वर्ष पूर्व लिखी एक कविता)
@ शलभ गुप्ता "राज" 

Wednesday, August 16, 2017

"अधूरी कवितायें..."

सिर्फ़ तुम पर ही लिखी हैं सारी कवितायें मैंने,
एक दिन सब तुमको ही सुनानी हैं।
कुछ कवितायें अधूरी रहीं, 
कुछ कवितायें लिख ना सके।
कुछ कवितायें तुम सुन ना सके, 
कुछ कवितायें हम सुना ना सके।
वक्त गुजर गया कुछ कवितायें कहने का,
कुछ कवितायें तुमको सुनाने का, 
अभी वक्त आया ही नहीं।
कई कवितायें, अभी तुम पर लिखनी बाकी हैं।
कई अधूरी कवितायें अभी पूरी करनी बाकी हैं।
हो जायेंगी एक दिन सब कवितायें पूरी ,
जीवन अनंत है आस है पूरी ।
इन्तजार लंबा है मगर, अनेकों जीवनकाल हैं।
तब तक, एक सर्वश्रेष्ठ कविता भी बन जायेगी।
सिर्फ़ तुम पर ही लिखी हैं सारी कवितायें मैंने,
एक दिन सब तुमको ही सुनानी हैं। 
© ® शलभ गुप्ता "राज"

Saturday, August 12, 2017

"फिर मिल ना सके ..."


बहारों के मौसम में भी फूल खिल ना सके ।
वह ऐसे बिछुड़े हमसे , फिर मिल ना सके।
हजारों ख्वाब थे, मगर कुछ ऐसे टूटे ,
ख्वाब आंखों में कभी , फिर आ ना सके ।
ख्वाहिशें डूब गयीं , आंसुओं के समुंदर में कहीं।
किनारे पर उनको कभी , फिर ला ना सके ।
वह ऐसे बिछुड़े हमसे , फिर मिल ना सके।
लिफाफों पर लिख कर नाम मेरा,
कोरा कागज़ वह भेजते रहे ।
आंसुओं से भीगे ख़त को , दिल से हम समझते रहे ।
सारे खतों के थे जवाब , मगर भेज ना सके ।
वह ऐसे बिछुड़े हमसे , फिर मिल ना सके।
यूं तो चमन में खिल रहे हैं , आज भी कई फूल मगर ,
खुशबू किसी में नहीं वैसी, जो सांसों में बस सके।
वह ऐसे बिछुड़े हमसे , फिर मिल ना सके।
@ शलभ गुप्ता "राज"

(कई वर्ष पूर्व लिखी हुई एक कविता)

Thursday, August 10, 2017

"कविता..."

कविता हर किसी को सुनाई नहीं जाती,
दिल की बात, सबसे  कही नहीं जाती।
कविता कहना कोई बड़ी बात नहीं है मगर,
कह देते हैं कविता हम तब,
जब दिल की बात लबों तक नहीं आती।
कविता, हर किसी पर लिखी नहीं जाती,
अधूरे रहते है शब्द सारे कविता के,
पंक्तियाँ जब तक अपनेपन का अहसास नहीं पातीं।
कविता लिखना कोई बड़ी बात नहीं है मगर,
लिख पाते हैं हम कविता तब,
जब तक वो निगाहें , 
प्रेरणा बनकर दिल में बस नहीं जाती।
कविता, हर किसी को समझ नहीं आती
क्योकिं, दिल से लिखी जाती है कविता;
दिमाग से लिखी नही जाती,
दिल वाले ही लिखते है,
दिल में रहने वालों पर कवितायें ,
यह दिल वालों की ऐसी बस्ती है,
दिल के सिवा और कहीं बसाई नहीं जाती।
@ शलभ गुप्ता "राज"
(कई वर्ष पूर्व लिखी हुई एक कविता )

Wednesday, August 9, 2017

"तुम मित्र मेरे..."

जब वक्त के दो राहे पर,
ठहर जाते हैं कदम मेरे,
आकर रास्ता दिखा जाते हो ।
ना जाने कहाँ से आ जाते हो ,
तुम मित्र मेरे !
हालातों के बिखरते हुए पलों में,
जब आंसुओं से भीगने लगते हैं नैन मेरे,
आकर मेरे लिए "कान्धा" बन जाते हो ।
ना जाने कहाँ से आ जाते हो ,
तुम मित्र मेरे !
जब कभी कुछ कहते - कहते
लड़खडाने लगते हैं होंठ मेरे,
आकर "नए शब्द" दे जाते हो।
ना जाने कहाँ से आ जाते हो ,
तुम मित्र मेरे !
उदासी से भरी ज़िन्दगी में,
कोई नहीं देता जब साथ मेरा,
मेरे संग होने का "आभास" दिला जाते हो।
ना जाने कहाँ से आ जाते हो ,
तुम मित्र मेरे !
एक ही मुलाकात ,
अब धरोहर है उम्र भर की ।
यूँ तो किस्मत ने दोबारा फिर मिलाया नहीं ,
दूर से ही मगर,
अपनेपन का अहसास दे जाते हो।
ना जाने कहाँ से आ जाते हो ,
तुम मित्र मेरे !

© ® शलभ गुप्ता