Tuesday, October 1, 2019

तुमको चिट्ठी लिखता हूँ ..

मैं, आज भी उसी मोड़ पर;
तुम्हारा इंतज़ार करता हूँ।
इंटरनेट के ज़माने में आज भी,
तुमको चिट्ठी लिखता हूँ। 

कुछ और पंक्तियाँ

[१]
हरे भरे पत्तों में,
अपनापन कहाँ। 
रास्ते की ख़ामोशी,
तो सूखे पत्ते ही तोड़ सके। 
[२]
कुछ सोचकर हम चुप रहे,
शायद, तुम कुछ ज़रूर कहोगे।
बिछुड़ते वक्त आखरी बार,
शायद, तुम मुड़कर देखोगे।
सहेजकर रखी हैं जो मेरी यादें,
शायद, तुम उन्हें वापस करोगे।
[३]
कदम मजबूती से रखो,
रास्ते खुद ही बनते जाते हैं। 
ऊंचे  नीचे रास्तों पर चलना,
राह के पत्थर ही  सिखाते हैं। 

कुछ पंक्तियाँ

[१] 
शिद्दत से उनको याद करेंगे, तो मुलाकात भी होगी।  
दिल की प्यासी धरती पर, प्रेम की बरसात भी होगी। 
[२]
इस दुनिया में सब, 
अजनबी हैं मेरे लिये। 
भीड़ है सड़कों पर बहुत,
तुम साथ - साथ चलो मेरे।  
खो ना जाऊं मैं कहीं,
हमेशा के लिए।  
[३]
ज़रा देर से तुम्हारा आना,
मुझे बहुत परेशां कर देता है। 
साँसें थमने लगती हैं मेरी,
दिल धड़कना बंद कर देता है। 
 [४]
छुपा कर रखी थी उनसे सारी। 
मेरी ख़ामोशी ने कह दी कहानी सारी। 

Monday, September 9, 2019

"विक्रम"

साँझ ढले,
जब छत पर आता हूँ मैं।
दो दिनों से चाँद को,
बहुत गौर से निहारता हूँ मैं।
उसकी चांदनी में,
बस "विक्रम" को तलाशता हूँ मैं।
@ शलभ गुप्ता 

"माँ .."























Thursday, August 29, 2019

"पुराने घर.."

बड़े शहर में नया घर है तो क्या ?
यादें आज भी, 
गांव के पुराने घर पर ही रहती हैं। 
@शलभ गुप्ता 

Thursday, August 1, 2019

"अनकही कहानियाँ.."

मन की कल्पनाओं को जब आकार मिल जाता है,
स्वप्न जैसे मानो कोई साकार हो जाता है।
वक़्त लिखता है फिर कई अनकही कहानियाँ,
B & W तस्वीरों में भी इंद्रधनुषी रंग आ जाता है।
© Shalabh Gupta ( 1 August 2019)


Thursday, July 25, 2019

"अजनबी के नाम.."

चर्चगेट से आती हुई,
आखिरी लोकल ट्रेन  की तरह,
खाली-खाली सी शाम हो गयी। 
शोर मचातीं आतीं लहरें ,
पत्थरों से टकराकर,
गुमनाम हो गयीं। 
घर के एक कोने में रखी,
रंग-बिरंगी छतरियाँ भी ;
बारिशों के ना आने से,
परेशान हो गयीं। 
मिलना ना होगा जिनसे कभी,
ज़िन्दगी "शलभ" की ,
उसी अजनबी के नाम हो गयी। 
@ शलभ गुप्ता "राज"

Monday, July 1, 2019

"आशाओं की नित नयी उड़ान है.."

आशाओं की नित नयी उड़ान है। "शानू" हमारे घर की शान है। प्रतिकूल हवाओं में भी उसका, जीवन-दीप प्रकाशमान है। उसके होठों पर रहती सदा, एक प्यारी सी मुस्कान है। एक दिन करेगा अपना नाम रोशन, माँ सरस्वती का मिला उसे वरदान है। @ शलभ गुप्ता

















Wednesday, June 26, 2019

"कुछ गुलदस्ते.."

कांटों की चुभन को अपनाकर, फूलों के कुछ गुलदस्ते बनाये हैं। तब कहीं जाकर "शलभ", अपने चेहरे पर मुस्कान लाये हैं। @ शलभ गुप्ता