Thursday, August 11, 2022

"रंगमंच" है जिंदगी..

दर्शक भी हम,
कलाकार भी हम। 
ताली बजाने वाले भी हम,
पर्दा गिराने वाले भी हम। 
लाइट वाले भी हम,
साउंड वाले भी हम। 
हमारी लिखी स्क्रिप्ट,
हमें ही सुनाती है जिंदगी। 
एक दिन में,
कई किरदार,
निभाती है जिंदगी,
"रंगमंच" है जिंदगी।   

Thursday, July 14, 2022

"महंगा सिलिंडर.."

मुफ्त राशन पाकर भी,
भूखा रह गया गरीब। 
महंगा सिलिंडर उससे,
अब खरीदा नहीं जाता। 

"इंद्रदेव जी.."

सोच रहा हूँ,
कल सुबह ११ बजे,
बारिश के विषय में,
एक ज्ञापन,
इंद्रदेव जी को,
दे ही दिया जाए। 
हमारे शहर से,
क्या नाराजगी है,
इसका भी तो,
पता किया जाए। 

"कीमत .."

ज़रूरत से ज्यादा समय,
जब कोई किसी को देता है। 
तब समय देने वाला शख्स,
अपनी कीमत खो देता है। 

Friday, July 1, 2022

"पहली बारिश.."

आज,
मौसम का,
पहला,
भीगा हुआ,
अखबार,
घर आया है। 
खैर मकदम !

मेरे शहर  में, 
इस मानसून की पहली बारिश। 

Monday, June 27, 2022

"रेत पर नाम.."

मेरे दिल में,
धड़कता है,
यह शहर तेरा। 
सांझ ढले,
मुझसे मिलने,
समुन्दर किनारे,
आ जाना। 
लहरों ने,
संभालकर रखा है,
आज भी,
रेत पर नाम मेरा।   


Thursday, June 23, 2022

"ज़िन्दगी.."

जिसको,
ठोकर खाकर,
संभलना आ गया।  
समझो उसको,
ज़िन्दगी,
जीना आ गया।  

"अपना कुछ भी नहीं.."

"शरीर" माता पिता का,
"आत्मा" परमात्मा की। 
उपहार में मिले,
पैंट  - शर्ट के,
कपड़े सिलवाकर,
बड़े बेटे द्वारा, 
मेरे लिए,
ऑनलाइन मंगवाए,
नए एक जोड़ी,
जूतों को पहनकर,
बन गए हम बाबू जी। 
अपना कुछ भी नहीं।   

Wednesday, June 8, 2022

"पूरे 27 बरस बाद.."

भवाली, भीमताल यात्रा की बातें और यादें 
इन पंक्तियों में : (5 जून 2022)

आये हो कितने बरस बाद,
इन पहाड़ों ने पूछा मुझसे। 
आया हूँ पूरे 27 बरस बाद,
हिसाब लगाकर कहा उससे। 



"अपनों के गांव में.."

भवाली, भीमताल यात्रा की बातें और यादें 
इन पंक्तियों में : (5 जून 2022)
[१] 
इन पहाड़ों से रिश्ते मेरे बड़े पुराने हैं। 
सफर के रास्ते सारे जाने पहचाने हैं। 
[२]
ज़िन्दगी के सारे गुलाब देकर उसे,
कैक्टस सारे अपने नाम कर लिए। 
[३]
शहर के कोलाहल से दूर, पेड़ों की ठंडी छाँव में। 
चलते चलते आ ही गए हम, अपनों के गांव में।