Sunday, June 29, 2014

"पुरानी किताब.."


शहर में रह कर भी अनजान सा हूँ ।
अपनों के बीच भी गुमनाम सा हूँ ।
पत्थरों का मोल लगाती है यह दुनिया,
हीरों के शहर में भी बे-भाव सा हूँ ।
सुबह हो न सकी जिस दिन की कभी,
उस दिन की ढलती शाम सा हूँ ।
वक्त की गर्द क्या चढ़ी नयी किताब पर,
दिखता आजकल पुरानी किताब सा हूँ।

(शलभ गुप्ता "राज")

Wednesday, June 11, 2014

मेघा..

Megh, Tum Kab Aaoge Mere Desh ?
Aapki Pratiksha Me Saansen Reh Gayi Shesh :)

मेघा , तुम कब आओगे मेरे देश ?
आपकी प्रतीक्षा में साँसें रह गयी शेष।

शलभ गुप्ता "राज" 

Monday, May 19, 2014

"पत्थर दिल.."

अक्सर ना जाने क्या टूटता है मुझमें ,
लोग तो कहते हैं पत्थर दिल है मेरा !
Aksar Naa Jaane Kya Tutta Hai Mujhme,
Log To Kehate Hain Patthar Dil Hai Mera !
( शलभ गुप्ता "राज")

Sunday, May 11, 2014

"माँ" सिर्फ एक शब्द नहीं...

"माँ" सिर्फ एक शब्द नहीं,
सम्पूर्ण जीवन का वृतांत है।
उससे ही है हमारा अस्तित्व ,
संसार में एक पहचान है।
हर दिन उनके लिए ख़ास है,
"माँ" का साथ, जिनके पास है।
माँ के लिए , एक ही दिन नहीं,
सारा जीवन उनके नाम है।
उससे ही है हमारा अस्तित्व ,
संसार में एक पहचान है।
(शलभ गुप्ता "राज")

Thursday, May 1, 2014

"घर अब खाली सा लगता है ...."

घर अब खाली सा लगता है ।
घर में नहीं, अब मन लगता है ।
ना जाने कैसी खामोशी है घर में ,
क्या हो गया यह कुछ ही दिन में ।
दिल है मगर धड़कन नहीं ,
साज है मगर आवाज़ नहीं ,
सब कुछ सूना सा लगता है ।
जीवन के इस नाजुक मोड़ पर,
आप साथ छोड़ कर चले गये । 
बीते लम्हें जब याद आते हैं ,
आखों में आंसुओं का मेला लगता है । 
सब कुछ सूना सा लगता है । 
घर में नहीं, अब मन लगता है। 
जीने को तो जी ही लेंगे हम मगर,
बिना आपके , यह जीवन 
अब बोझिल सा लगता है । 
घर अब खाली सा लगता है । 
घर में नहीं, अब मन लगता है ।

( मेरे पूज्य पिताश्री को समर्पित )

Sunday, April 13, 2014

"नये ज़ख्म..."

जो किसी के दर्द में शामिल नहीं हैं,

वो लोग दोस्ती के काबिल नहीं हैं ,

पुरानों ने दिये कुछ नये ज़ख्म,

नये दोस्तों की और ज़रूरत नहीं हैं।

(शलभ गुप्ता "राज")

Wednesday, February 26, 2014

"प्रेम-गीत ..."

खामोशियाँ बोलने लगीं हैं, 
"राज" सारे खोलने लगी हैं ,
कान्हा की बांसुरी के संग ,
गोपियाँ प्रेम-गीत गाने लगी हैं . "

Wednesday, February 19, 2014

"प्यास..."

बादल झूठे हो सकते हैं,
धरती की प्यास नहीं,
मुस्कराहटें झूठी हो सकती हैं,
मगर एहसास नहीं।  

Saturday, February 15, 2014

" धरोहर..."

वो फूल आज भी महकते हैं,
दिल में दीये आज भी जलते हैं,
तेरी दुआएँ हैं धरोहर मेरी,
तेरी यादों संग हम चलते हैं।  
( शलभ गुप्ता "राज")

Tuesday, February 11, 2014

"खुशबू..."

रूप बदल-बदलकर मुझसे मिलने आता है,
वो शख्स मुझसे ना जाने क्या चाहता है ?
जब भी उससे पूछा उसके आने का सबब,
बस खुशबू की तरह सांसों में घुल जाता है .
( शलभ गुप्ता "राज")