Friday, March 20, 2015

अपने हिस्से का "दाना"....





आजकल,
चिड़ियाँ भी कम नज़र आने लगी हैं ,
मेरी छत की मुंडेर पर ।
क्या इन्हें भी पता चल गया मेरे जाने का ?
चिड़ियों, तुम चिंता मत करना ।
मैंने , बहुत सारे "अनाज के दाने "..
लाकर रख दिये हैं ,
मेरी छत पर बने एक कमरे में ।
घर में सबको कह दिया है,
और अच्छे से सबको समझा भी दिया है ।
मेरे दोनों बच्चे सुबह और शाम ,
छत की मुंडेर पर "दाना" रख दिया करेगें ।
सब कुछ तुम्हारा ही तो है ।
इन "दानों" पर हक़ तुम्हारा है ।
मैं कहीं भी रहूँ ,
तुम कभी चिंता मत करना ।
मेरी छत पर रोजाना ,
इसी तरह आते रहना ।
अपने हिस्से का "दाना",
तुम इसी तरह चुगते रहना ।

Saturday, February 21, 2015

"बेटी.."

[१]
"बेटी" सिर्फ एक शब्द नहीं,
खुशियों का पावन नाम है ।
उससे ही है पूजा-आरती,
वह घर तीरथ-धाम है ।
[२]
तुलसी का पौधा ज़रूरी नहीं,
जहाँ बेटी का जन्म हो जाता है ।
जिस घर में होती है "बेटी",
वह घर मंदिर हो जाता है । 

" बेटियाँ.."

नाज़ुक सी टहनियों पर फूलों की लड़ियाँ,
वो खिलती  कलियाँ घर में आती ढेरों खुशियाँ ,
ओंस की बूंदों जैसी होती हैं बेटियाँ ,
जीने का सबब होती हैं बेटियाँ ,
माता-पिता की अनमोल धरोहर हैं बेटियाँ ,
अपने घर में भी मेहमान होती हैं बेटियाँ ,
विदा करके उनको निभाना है दस्तूर,
फिर उम्रभर बहुत याद आती हैं बेटियाँ।  

"माँ .."

सकून से सो जाते हैं बच्चे रात भर,
माँ का लोरी सुनाना ज़रूरी है।
संवर जाती है ज़िन्दगी बच्चों को,
घर में एक माँ बहुत ज़रूरी है। 

Wednesday, February 11, 2015

एक यादगार तस्वीर..

मुरादाबाद में 8 फरवरी 2015 को आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मलेन में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शायर जनाब मंसूर उस्मानी जी, "यश- भारती" से सम्मानित कवि डॉ. विष्णु सक्सेना जी एवं संस्कार भारती-मुरादाबाद के महानगर अध्यक्ष बाबा संजीव आकांक्षी  जी के साथ.. एक यादगार तस्वीर !


Friday, September 19, 2014

"ऐ - बारिशों.."

बिन बुलाये मेहमान की तरह ,
हर रोज़ चली आती हो,
मेरी प्रिय बारिशों,
अब तो लौट जाओ जरा।

शलभ गुप्ता "राज"
मुंबई

Saturday, July 19, 2014

"दिल के कागज़ पर.."

कल रात समुन्दर बहुत रोया है शायद, 
दोपहर तक किनारे की सारी रेत भीगी हुई थी। 
वह पढने लगे है अब मेरी कहानियाँ, 
दिल के कागज़ पर अब तक जो लिखी हुई थी । 
सुलझने लगी है अब ज़िन्दगी की पहेलियाँ , 
बरसों से अब तक जो उलझी हुई थी । 
एक डायरी के पन्नों को लगे हैं हम पलटने, 
एक जमाने से अलमारी में जो रखी हुई थी ।
( Shalabh Gupta "Raj")

Wednesday, July 16, 2014

"आप सबकी दुआओं में असर चाहिये..."


ना गुब्बारे, खिलोने, ना उसे मिठाई चाहिये।
हमसे ना उसको कोई तोहफा चाहिये ।
खुशियों का बस उसे साथ चाहिये ।
आप सबकी दुआओं में असर चाहिये ।
खूब भीगता है वह बारिशों के मौसम में ;
इन्द्रधनुष के रंगों को देखने के लिए मगर,
आखों में "उसे" रौशनी चाहिये।
आप सबकी दुआओं में असर चाहिये ।
लिखे हुए से ज़्यादा कोई जी सकता नहीं,
अपनी ज़िन्दगी के सारे लम्हें ,
चाहकर भी मैं उसे दे सकता नहीं...
बस में होता हमारे अगर,
फिर कोई कभी मरता नहीं,
कुदरत का कोई करिश्मा चाहिये।
आप सबकी दुआओं में असर चाहिये ।
हारना उसने ना सीखा है कभी,
मुस्कारते हुए जीता है वह हर लम्हें सभी,
ज़िन्दगी जीने की उस जैसी ,बस ललक चाहिये।
आप सबकी दुआओं में असर चाहिये ।




Sunday, July 13, 2014

"मुंबई की बारिशें..."

[१]

बारिशों में भीगकर मुंबई सयानी हुई,
जैसे किसी के प्यार में दीवानी हुई !

[२]

पायल में घुँघरू छनकते हैं जैसे,
आसमां से बूँदें बरसती हैं ऐसे !

( शलभ गुप्ता "राज")

Tuesday, July 1, 2014

"पहले जैसे इन्द्रधनुष अब बनते नहीं हैं .."

ऐसा नहीं कि  बूंदों से मुझे प्यार नहीं है।
अब की बारिशों पर मुझे ऐतबार नहीं हैं।
आती हैं घटायें  किसी अजनबी की तरह।
पहले की तरह अब बरसती नहीं हैं।
बूंदों में  अपने पन का अहसास नहीं हैं।
पहले जैसे इन्द्रधनुष  अब बनते नहीं हैं।
ऐसा नहीं कि  बूंदों से मुझे प्यार नहीं है।
अब की बारिशों पर  मुझे ऐतबार नहीं हैं।
बदल गया है वक्त बदल गया ज़माना ,
खुले मन से अब "दोस्त" मिलते नहीं हैं ।
पहले जैसे इन्द्रधनुष अब बनते नहीं हैं ।