बिजलियाँ तो अक्सर गिरा करती हैं मुझ पर,
और मेरा दामन भी जला देतीं हैं अक्सर,
गम नहीं मुझे इस बात का दोस्तों,
कि वो मेरा दामन जलाती हैं ।
इस बात का भी दुःख नहीं मुझको,
कि कुछ लोग उस वक्त
मेरे दामन को हवा देते हैं।
दुःख है तो "राज" को
सिर्फ़ इस बात का ,
इस कोशिश में वह लोग,
अपना हाथ जला बैठते हैं।
My Poems .... My Life....
I am Shalabh Gupta from India. Poem writing is my passion. I think, these poems are few pages of my autobiography. My poems are my best friends.
Friday, March 16, 2012
Tuesday, March 6, 2012
"चाहे, हौले-हौले चल ..."
अपने क़दमों पर कर भरोसा ,
एक ही रास्ते पर चल ।
चाहे, हौले-हौले चल ।
उबड़-खाबड़ देख कर,
रास्ता ना बदल ।
चाहे, हौले-हौले चल ।
गिरकर, संभलता चल ।
ठोकरों से सीखता चल ।
चाहे, हौले-हौले चल ।
रंग-बिरंगी कारें देख कर,
मन ना मचल ।
समय तेरा भी आयेगा ,
जरा सब्र तो कर ।
मिल ही जायेगी मंजिल,
आज , नहीं तो कल !
अपने क़दमों पर कर भरोसा ,
एक ही रास्ते पर चल ।
चाहे, हौले-हौले चल ।
एक ही रास्ते पर चल ।
चाहे, हौले-हौले चल ।
उबड़-खाबड़ देख कर,
रास्ता ना बदल ।
चाहे, हौले-हौले चल ।
गिरकर, संभलता चल ।
ठोकरों से सीखता चल ।
चाहे, हौले-हौले चल ।
रंग-बिरंगी कारें देख कर,
मन ना मचल ।
समय तेरा भी आयेगा ,
जरा सब्र तो कर ।
मिल ही जायेगी मंजिल,
आज , नहीं तो कल !
अपने क़दमों पर कर भरोसा ,
एक ही रास्ते पर चल ।
चाहे, हौले-हौले चल ।
Friday, February 24, 2012
"तस्वीरे ज़िन्दगी की...."
एक बार कहा था किसी ने , कि “बोलती हैं तस्वीरें ” ,
आज महसूस हुआ मुझे , सच बोलती है तस्वीरें ”
बिना शब्दों के ही , सारी कहानी कहती है तस्वीरें ..
कभी फूलों की तरह मुस्कराती हैं तस्वीरें ,
कभी इन्द्रधनुष में रंग भरती हैं तस्वीरें ,
अक्सर अपने आंसू छुपा जाती हैं तस्वीरें ,
बिना कुछ कहे , बहुत कुछ कह जाती है तस्वीरें ..
ज़िन्दगी के सारे रंग दिखा जाती हैं तस्वीरें ...
हर हाल में मुस्कराना सिखा जाती है तस्वीरें ...
बिना कुछ कहे , बहुत कुछ कह जाती है तस्वीरें ..
आज महसूस हुआ मुझे , सच बोलती है तस्वीरें ”
बिना शब्दों के ही , सारी कहानी कहती है तस्वीरें ..
कभी फूलों की तरह मुस्कराती हैं तस्वीरें ,
कभी इन्द्रधनुष में रंग भरती हैं तस्वीरें ,
अक्सर अपने आंसू छुपा जाती हैं तस्वीरें ,
बिना कुछ कहे , बहुत कुछ कह जाती है तस्वीरें ..
ज़िन्दगी के सारे रंग दिखा जाती हैं तस्वीरें ...
हर हाल में मुस्कराना सिखा जाती है तस्वीरें ...
बिना कुछ कहे , बहुत कुछ कह जाती है तस्वीरें ..
Monday, February 20, 2012
"मंजिल है दूर, मगर चलते जाना है..."
मंजिल है दूर, मगर चलते जाना है।
लक्ष्य को एक दिन ज़रूर पाना है।
सातवें आसमान से आगे हमको जाना है।
मुड़कर ना पीछे कभी देखना है।
मंजिल ना मिले, हमे जब तक...
बस चलते जाना है, चलते जाना है।
लक्ष्य को एक दिन ज़रूर पाना है।
अस्तित्व है हमारा , कुछ कर के दिखाना है।
जीवन हमारा व्यर्थ नहीं जाना है।
ज़िन्दगी में करने हैं अभी काम बहुत,
हर क्षेत्र में विजेता बन कर दिखाना है।
लक्ष्य को एक दिन ज़रूर पाना है।
बीता हुआ पल फिर नहीं आना है।
हर पल है मूल्यवान, बातों में नहीं गंवाना है।
जीवनं को सार्थक कर के दिखाना है।
लक्ष्य को एक दिन ज़रूर पाना है।
पल प्रति पल , जीवन और भी कठिन होते जाना है।
असफलताओं के चक्रव्यहू को तोड़ कर जाना है।
अर्थहीन जीवन को, अर्थ पूर्ण बनाना है।
लक्ष्य को एक दिन ज़रूर पाना है।
लक्ष्य को एक दिन ज़रूर पाना है।
सातवें आसमान से आगे हमको जाना है।
मुड़कर ना पीछे कभी देखना है।
मंजिल ना मिले, हमे जब तक...
बस चलते जाना है, चलते जाना है।
लक्ष्य को एक दिन ज़रूर पाना है।
अस्तित्व है हमारा , कुछ कर के दिखाना है।
जीवन हमारा व्यर्थ नहीं जाना है।
ज़िन्दगी में करने हैं अभी काम बहुत,
हर क्षेत्र में विजेता बन कर दिखाना है।
लक्ष्य को एक दिन ज़रूर पाना है।
बीता हुआ पल फिर नहीं आना है।
हर पल है मूल्यवान, बातों में नहीं गंवाना है।
जीवनं को सार्थक कर के दिखाना है।
लक्ष्य को एक दिन ज़रूर पाना है।
पल प्रति पल , जीवन और भी कठिन होते जाना है।
असफलताओं के चक्रव्यहू को तोड़ कर जाना है।
अर्थहीन जीवन को, अर्थ पूर्ण बनाना है।
लक्ष्य को एक दिन ज़रूर पाना है।
Tuesday, February 7, 2012
"हमें हर हाल में मुस्कराना है..."
"जख्म कितना भी गहरा सही,
दर्द तो बस छुपाना है।
हमें हर हाल में मुस्कराना है ।
वक्त , हर समय नहीं रहता एक सा....
हर मौसम आना - जाना है।
हमें हर हाल में मुस्कराना है ।
निराश होने से कुछ नहीं हासिल,
जो सह गया काटों की चुभन को,
"गुलशन" उसका हो जाना है।
हमें हर हाल में मुस्कराना है ।"
दर्द तो बस छुपाना है।
हमें हर हाल में मुस्कराना है ।
वक्त , हर समय नहीं रहता एक सा....
हर मौसम आना - जाना है।
हमें हर हाल में मुस्कराना है ।
निराश होने से कुछ नहीं हासिल,
जो सह गया काटों की चुभन को,
"गुलशन" उसका हो जाना है।
हमें हर हाल में मुस्कराना है ।"
Friday, January 27, 2012
"यदि आँखों में किसी की , कोई नमी नहीं हैं..."
यदि आँखों में किसी की,
कोई नमी नहीं हैं।
धरती उस दिल की,
फिर उपजाऊ नहीं है।
संवेदनाओं का एक भी पौधा,
अंकुरित होता नहीं जहाँ,
ऐसा बंज़र जीवन,
जीने के योग्य नहीं हैं।
कोई नमी नहीं हैं।
धरती उस दिल की,
फिर उपजाऊ नहीं है।
संवेदनाओं का एक भी पौधा,
अंकुरित होता नहीं जहाँ,
ऐसा बंज़र जीवन,
जीने के योग्य नहीं हैं।
Tuesday, November 15, 2011
"बचपन के दिन..."
बचपन के सुनहरे लम्हों को जी लो भरपूर,
बड़े होकर मासूम मुस्कराहटें हो जाती है बहुत दूर ।
काश कभी ऐसा हो जाये, सब कुछ देकर मुझे,
बचपन का एक दिन ही वापस मिल जाये ।
बड़े होकर मासूम मुस्कराहटें हो जाती है बहुत दूर ।
काश कभी ऐसा हो जाये, सब कुछ देकर मुझे,
बचपन का एक दिन ही वापस मिल जाये ।
Monday, November 14, 2011
"सच, बचपन के दिनों का क्या कहना ..."

माँ की गोद और पापा के कंधो पर झूलना ।
दादी से परियों की कहानियाँ सुनना ।
खिलोनों को हाथों में थामे ही मीठे सपनों में खो जाना ।
सच, बचपन के दिनों का क्या कहना ।
पेंसिल से दीवारों पर चाँद-तारे बनाना ।
स्कूल ना जाने के कई बहाने बनाना ।
कभी कॉपी और कभी किताबों का खो जाना ।
माँ का डांटना भी तब, लोरी सा लगना ।
सच, बचपन के दिनों का क्या कहना ।
रसोई में जाकर चुप-चुप कर मिठाई खाना ।
और उस दिन जब चूहे महाराज का,
मेरे पैरों पर से गुज़र जाना ।
घबराहट में सब लड्डुओं का फर्श पर बिखर जाना ।
माँ का डांटना भी तब, लोरी सा लगना ।
सच, बचपन के दिनों का क्या कहना ।
जब भी याद आते हैं बचपन के दिन,
बहुत याद आता है मुझे बार-बार,
मेरा अधूरा होम-वर्क और टूटा खिलौना ।
दादी से परियों की कहानियाँ सुनना ।
खिलोनों को हाथों में थामे ही मीठे सपनों में खो जाना ।
सच, बचपन के दिनों का क्या कहना ।
पेंसिल से दीवारों पर चाँद-तारे बनाना ।
स्कूल ना जाने के कई बहाने बनाना ।
कभी कॉपी और कभी किताबों का खो जाना ।
माँ का डांटना भी तब, लोरी सा लगना ।
सच, बचपन के दिनों का क्या कहना ।
रसोई में जाकर चुप-चुप कर मिठाई खाना ।
और उस दिन जब चूहे महाराज का,
मेरे पैरों पर से गुज़र जाना ।
घबराहट में सब लड्डुओं का फर्श पर बिखर जाना ।
माँ का डांटना भी तब, लोरी सा लगना ।
सच, बचपन के दिनों का क्या कहना ।
जब भी याद आते हैं बचपन के दिन,
बहुत याद आता है मुझे बार-बार,
मेरा अधूरा होम-वर्क और टूटा खिलौना ।
Friday, November 11, 2011
"दोस्तों के शहर में...."
कुछ इस तरह ,खुद को सजा दी हमने।
दोस्तों के शहर में "अजनबी" बनकर जिया हमने।
मुस्कराते रहे लब ,अश्कों को पिया हमने ।
तन्हा ही यह सफ़र तय किया हमने ।
दोस्तों के शहर में "अजनबी" बनकर जिया हमने।
मुस्कराते रहे लब ,अश्कों को पिया हमने ।
तन्हा ही यह सफ़र तय किया हमने ।
Wednesday, October 26, 2011
"दीपावली" की हार्दिक शुभकामनाएँ ..."
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