Wednesday, August 16, 2017

"अधूरी कवितायें..."

सिर्फ़ तुम पर ही लिखी हैं सारी कवितायें मैंने,
एक दिन सब तुमको ही सुनानी हैं।
कुछ कवितायें अधूरी रहीं, 
कुछ कवितायें लिख ना सके।
कुछ कवितायें तुम सुन ना सके, 
कुछ कवितायें हम सुना ना सके।
वक्त गुजर गया कुछ कवितायें कहने का,
कुछ कवितायें तुमको सुनाने का, 
अभी वक्त आया ही नहीं।
कई कवितायें, अभी तुम पर लिखनी बाकी हैं।
कई अधूरी कवितायें अभी पूरी करनी बाकी हैं।
हो जायेंगी एक दिन सब कवितायें पूरी ,
जीवन अनंत है आस है पूरी ।
इन्तजार लंबा है मगर, अनेकों जीवनकाल हैं।
तब तक, एक सर्वश्रेष्ठ कविता भी बन जायेगी।
सिर्फ़ तुम पर ही लिखी हैं सारी कवितायें मैंने,
एक दिन सब तुमको ही सुनानी हैं। 
© ® शलभ गुप्ता "राज"

Saturday, August 12, 2017

"फिर मिल ना सके ..."


बहारों के मौसम में भी फूल खिल ना सके ।
वह ऐसे बिछुड़े हमसे , फिर मिल ना सके।
हजारों ख्वाब थे, मगर कुछ ऐसे टूटे ,
ख्वाब आंखों में कभी , फिर आ ना सके ।
ख्वाहिशें डूब गयीं , आंसुओं के समुंदर में कहीं।
किनारे पर उनको कभी , फिर ला ना सके ।
वह ऐसे बिछुड़े हमसे , फिर मिल ना सके।
लिफाफों पर लिख कर नाम मेरा,
कोरा कागज़ वह भेजते रहे ।
आंसुओं से भीगे ख़त को , दिल से हम समझते रहे ।
सारे खतों के थे जवाब , मगर भेज ना सके ।
वह ऐसे बिछुड़े हमसे , फिर मिल ना सके।
यूं तो चमन में खिल रहे हैं , आज भी कई फूल मगर ,
खुशबू किसी में नहीं वैसी, जो सांसों में बस सके।
वह ऐसे बिछुड़े हमसे , फिर मिल ना सके।
@ शलभ गुप्ता "राज"

(कई वर्ष पूर्व लिखी हुई एक कविता)

Thursday, August 10, 2017

"कविता..."

कविता हर किसी को सुनाई नहीं जाती,
दिल की बात, सबसे  कही नहीं जाती।
कविता कहना कोई बड़ी बात नहीं है मगर,
कह देते हैं कविता हम तब,
जब दिल की बात लबों तक नहीं आती।
कविता, हर किसी पर लिखी नहीं जाती,
अधूरे रहते है शब्द सारे कविता के,
पंक्तियाँ जब तक अपनेपन का अहसास नहीं पातीं।
कविता लिखना कोई बड़ी बात नहीं है मगर,
लिख पाते हैं हम कविता तब,
जब तक वो निगाहें , 
प्रेरणा बनकर दिल में बस नहीं जाती।
कविता, हर किसी को समझ नहीं आती
क्योकिं, दिल से लिखी जाती है कविता;
दिमाग से लिखी नही जाती,
दिल वाले ही लिखते है,
दिल में रहने वालों पर कवितायें ,
यह दिल वालों की ऐसी बस्ती है,
दिल के सिवा और कहीं बसाई नहीं जाती।
@ शलभ गुप्ता "राज"
(कई वर्ष पूर्व लिखी हुई एक कविता )

Wednesday, August 9, 2017

"तुम मित्र मेरे..."

जब वक्त के दो राहे पर,
ठहर जाते हैं कदम मेरे,
आकर रास्ता दिखा जाते हो ।
ना जाने कहाँ से आ जाते हो ,
तुम मित्र मेरे !
हालातों के बिखरते हुए पलों में,
जब आंसुओं से भीगने लगते हैं नैन मेरे,
आकर मेरे लिए "कान्धा" बन जाते हो ।
ना जाने कहाँ से आ जाते हो ,
तुम मित्र मेरे !
जब कभी कुछ कहते - कहते
लड़खडाने लगते हैं होंठ मेरे,
आकर "नए शब्द" दे जाते हो।
ना जाने कहाँ से आ जाते हो ,
तुम मित्र मेरे !
उदासी से भरी ज़िन्दगी में,
कोई नहीं देता जब साथ मेरा,
मेरे संग होने का "आभास" दिला जाते हो।
ना जाने कहाँ से आ जाते हो ,
तुम मित्र मेरे !
एक ही मुलाकात ,
अब धरोहर है उम्र भर की ।
यूँ तो किस्मत ने दोबारा फिर मिलाया नहीं ,
दूर से ही मगर,
अपनेपन का अहसास दे जाते हो।
ना जाने कहाँ से आ जाते हो ,
तुम मित्र मेरे !

© ® शलभ गुप्ता 

"दिल की बातें..."

तुम्हें तो अब शायद,
याद  भी नहीं होगा।
गहरे पीले रंग का ,
तुम्हारा एक रूमाल ,
मेरे पास रह गया था।
उसी में बांधकर रखी  हैं,
तुम्हारे संग बीते हुए ,
लम्हों की सारी यादें।
डायरी के पन्नों पर,
लिखी हैं सारी बातें।
तुम्हें तो अब शायद ,
याद  भी नहीं होगा।
तुमने जो ग्रीटिंग कार्ड्स ,
मुझको वापस भेज दिए थे,
सब संभालकर रखें है मैंने।
क्योंकि, उन लिफाफों पर;
मेरा नाम जो लिखा है,
तुमने अपने हाथों से।  
बहुत सुन्दर लिखती हो,
बिलकुल अपनी तरह।
तुम्हें तो अब शायद ,
याद  भी नहीं होगा।
© ® शलभ गुप्ता
(अभी बहुत कुछ लिखना  बाकी है ,
शेष फिर कभी लिखेंगें दिल की बातें )


"आखिर क्यों.."


हज़ारों लोग मिले ,
मौज़ों की रवानी में , 
तुम ही बस याद रहे ,
ज़िन्दगी की कहानी में।
(तस्वीर:
यादों की एक डायरी से)
ऐसा तो होता है ,
मगर ;
ऐसा आखिर क्यों होता है ?
@ शलभ गुप्ता

Tuesday, July 25, 2017

"यादें और सावन.."

छा जाओ, बरस जाओ,
दिलों में, शहर में।
कभी यादें बनकर।
कभी सावन बनकर।
@ शलभ गुप्ता 

"मैंने देखा है अक्सर.."

हाईवे से गुज़रते हुए ,
सड़क के दोनों ओर,
हरे-भरे पेड़ों के बीच,
मैंने देखा है अक्सर,
कई पेड़ सूखे हुए।
@ शलभ गुप्ता 

Monday, July 17, 2017

"हमनें देखा है अक्सर,..."

प्रेम की डगर पर,
भीड़ भरे चौराहों पर,
हमनें देखा है अक्सर,
लोगों को रास्ता बदलते हुए।  
आजकल महफिलों में,
हमनें देखा है अक्सर,
प्लास्टिक की मुस्कान लिए,
दोस्तों को बातें करते हुए।  
बड़े-बड़े शहरों की,
ऊँची-ऊँची इमारतों में,
हमनें देखा है अक्सर,
बुज़ुर्गों को गुमसुम रहते हुए। 
@ शलभ गुप्ता "राज"


Friday, July 14, 2017

"नैना .."

बोझिल पलकें, नैना हैं भारी।
जाने कहाँ गयी नींदें हमारी।
@ शलभ गुप्ता