Friday, December 31, 2010

"ऐ- लहरों , हौले-हौले आना ज़रा .."



ऐ- लहरों , हौले-हौले आना ज़रा ।
समुन्दर किनारे घर है मेरा ।
यूँ तो तूफानों से मैं डरता नहीं ।
रेत के घरौंदे अब मैं बनाता नहीं ।
फिर भी, तुम ख्याल रखना ज़रा ।
ऐ- लहरों , हौले-हौले आना ज़रा ।
अजनबी शहर में, कोई नहीं अपना मेरा ।
दिल की बात , तुमसे कहनी है ज़रा ।
बरसों पहले खो गया था एक "मोती" मेरा ।
होंगे लाखों मोती इस समुन्दर में ,
ढूँढना है मुझको , बस वही "मोती" मेरा ।
ऐ- लहरों , हौले-हौले आना ज़रा ।
दिल की बातों को समझो ज़रा ।
समुन्दर से आती हवाओं ने ,
कल रात बताया है मुझे सपनों में ,
बस यहीं मिलेगा "मोती" मेरा ।
ऐ- लहरों, मेरा साथ देना ज़रा ।
ढूँढ कर लाना है, बस वही "मोती" मेरा ।
ऐ- लहरों , हौले-हौले आना ज़रा ।

Wednesday, December 29, 2010

"वैसे तो सब ठीक है यहाँ ..."

रोज हल करता हूँ कई सवाल मगर,
ज़िन्दगी हर रोज,
एक नया सवाल लेकर आती है ।
वैसे तो सब ठीक है यहाँ ,
परदेस में मगर नींद नहीं आती है ।
आखों ही आखों में रात गुज़र जाती है ।
ज़िन्दगी हर रोज,
एक नया सवाल लेकर आती है
बच्चे पूछते हैं - "कब आओगे पापा ?"
आखें मेरी भर आती हैं ।
ज़िन्दगी हर रोज,
एक नया सवाल लेकर आती है

Saturday, December 25, 2010

"कल शाम समुन्दर से मुलाकात हो गयी ...."



कल शाम समुन्दर से मुलाकात हो गयी,

अजनबी थे हम उसके लिए मगर
कुछ देर में जान पहचान हो गयी,
आखों ही आखों में दिल की बात हो गयी।
एक समुन्दर था मेरी नजरों के सामने,
एक समुन्दर मेरी आखों में था ।
वो भी छलक जाता था लहर बन के ,
आखें भी छलक जाती थी याद बन के ।
कल शाम समुन्दर से मुलाकात ही गयी ......
शांत था बहुत समुन्दर, बस शोर हवाओं का था ।
मेरे लौटने का इन्तजार , किसी को आज भी था ।
लहरों का दर्द हम खूब समझते हैं ,
हर लहर की किस्मत में किनारा नहीं होता ।
कल शाम समुन्दर से मुलाकात ही गयी ......
खामोश है समुन्दर, मगर भवंर बहुत हैं ।
एक छोटा सा दिल ही तो है हमारा ,
पत्थरों पर चोट से पत्थर भी टूटते बहुत हैं ।
घर लौटते पंछी , घर लौटता सूरज ...
किनारे से घर लौटते हुए हजारों कदम ......
इन कदमों में मगर, मेरे कदम नहीं थे ।
कल शाम समुन्दर से मुलाकात ही गयी ।

Monday, December 20, 2010

"हर साँस मेरी , एक ऐसी कहानी लिख रही ..."



यात्रा अनवरत चल रही,
जीवन वृतान्त कह रही।
संकरा हुआ रास्ता हर मोड़ पर,
कदमों की गति निरंतर,
मंजिल की ओर बढ़ रही।
यात्रा अनवरत चल रही,
जीवन वृतान्त कह रही।
जीवन की मेरी गलतियाँ,
मेरा संबल बन रहीं।
मेरे पैरों के छालों को,
अब धरती भी अनुभव कर रही।
रास्ते की हर ठोकर,
"राज" को और भी निखार रही।
याद रहेगी दुनिया को सदियों तक,
हर साँस मेरी ,
एक ऐसी कहानी लिख रही।
यात्रा अनवरत चल रही,
जीवन वृतान्त कह रही।

Sunday, December 19, 2010

"तमाम उम्र याद आऊंगा ..."

महकता सा एक अहसास हूँ अपनेपन का ,
हौले-हौले दिल में उतर जाऊँगा ।
भीड़ है बहुत, पकड़ कर चलो हाथ मेरा,
बिछुड़ गया अगर, तमाम उम्र याद आऊंगा ।

"अभी विश्राम कहाँ ..."

बहुत दूर है मंज़िल,
अभी विश्राम कहाँ ।
करने हैं काम बहुत,
अभी विश्राम कहाँ ।

"बच्चों का मन रूठ गया ..."

घर पीछे छूट गया,
बच्चों का मन रूठ गया ।
छज्जे से बच्चों का ,
बार-बार देखना मुझे,
पलकें मेरी भिगो गया ।

Tuesday, December 14, 2010

"मेरा अनुग्रह तुम्हें स्वीकार करना ही होगा"


मेरी प्रिय "मंजरी",
मेरा अनुग्रह तुम्हें स्वीकार करना ही होगा।
अब तुम्हें खिलना ही होगा।
मेरे घर के आंगन में,
"तुलसी" का पौधा बनना ही होगा।
ना जाने कैसे अपने आप,
बिन बुलाये मेहमान की तरह,
काटों से भरे ये जिद्दी पौधे,
उग आते हैं मेरे घर में,
लहुलुहान कर देते हैं हाथ मेरे,
रोज़ ही हटाता हूँ उन पौधों को,
मगर अगले दिन,
और भी ज़्यादा उग आतें हैं ।
और अब तो,
मेरे मन को भी चुभने लगे हैं।
हर जगह दिखाई देने लगे हैं।
जीवन कष्टों में ही बीत गया,
वक्त, सचमुच मुझसे जीत गया।
कुछ पल खुशियों के अब देने ही होंगें।
उम्र भर "तपती रही" ज़िन्दगी को,
अब "तपोवन" बनना ही होगा।
मेरी प्रिय "मंजरी",
इसीलिए,
मेरा अनुग्रह तुम्हें स्वीकार करना ही होगा।
अब तुम्हें खिलना ही होगा।
मेरे घर के आंगन में,
"तुलसी" का पौधा बनना ही होगा।

Monday, December 13, 2010

"एक सूर्योदय , फिर नयी शुरुआत है । "

घना अँधेरा और बड़ी लम्बी रात है
चलो, अब कुछ लम्हों की ही तो बात है
खत्म हो जायेगी यह काली रात ,
एक सूर्योदय , फिर नयी शुरुआत है

Saturday, December 11, 2010

"मेरे लिए तो वह पल, शताब्दी बनकर ठहर गया वहीं .."



ढूंढ़ता हूँ बहुत, मगर मिलता ही नहीं ।
चाँद मेरे आसमान का खो गया कहीं ।
पथरा गई हैं निगाहें कर-कर के इंतज़ार,
मेरी छत की मुंडेर पर ,
अब कोई काग भी बोलता नहीं।
ढूंढ़ता हूँ बहुत, मगर मिलता ही नहीं ।
वो जाते हुए आपका मुड़कर देखना मुझे।
यूँ तो आपके भीगे नैनो ने कह दिया था बहुत।
फिर भी कुछ बातें थी ख़ास, जो दिल में ही रहीं।
ढूंढ़ता हूँ बहुत, मगर मिलता ही नहीं ।
चाँद मेरे आसमान का खो गया कहीं
लड़खड़ाते हुए कदम थे आपके,
थम गई थी धड़कने "राज" के दिल की।
जुदा हो रहे थे जब हम तुम,
मेरे लिए तो वह पल,
शताब्दी बनकर ठहर गया वहीं।
ढूंढ़ता हूँ बहुत, मगर मिलता ही नहीं ।
चाँद मेरे आसमान का खो गया कहीं

(फोटो : आभार गूगल)

Thursday, December 9, 2010

"एक भी चाँद नहीं मेरे आसमान में।"




होंगें कई चाँद और आसमानों में,
एक भी चाँद नहीं मेरे आसमान में।
कई दिनों से हो रही घनघोर
बरसात आज थम गई है ।
एक भी इन्द्रधनुष नहीं मेरे आसमान में।
होंगें कई चाँद और आसमानों में,
एक भी चाँद नहीं मेरे आसमान में।
उनकी प्यार भरी बातों में आकर ,
दे दिए सारे सितारे भी मैंने।
अब ना चाँदनी है ना रोशनी कोई,
काली स्याह रात है बस मेरे आसमान में।
रेगिस्तान में घर बनाया,
ज़िन्दगी भर दिल को तड़पाया।
कह दो "राज" तुम उनसे जाकर,
बिना नीर के बादल हैं बस मेरे आसमान में।
होंगें कई चाँद और आसमानों में,
एक भी चाँद नहीं मेरे आसमान में।

Tuesday, December 7, 2010

"हिचकियाँ सारी रात आतीं रहीं ..."



कल रात तेरी यादों ने सताया बहुत ,
हिचकियाँ सारी रात आतीं रहीं ,
“राज ” को रुलाया बहुत ।
यूँ तो हवा थी थमी हुई मगर,
उम्मीद का दिया टिमटिमाया बहुत।
बहुत छोटी है जिंदगी की किताब मेरी ,
एक ही पन्ने पर अटकी है साँस मेरी ,
लहू से लिखा है , जिस पर तेरा नाम बहुत।
मिल न सके हम , बिछुड़ना पड़ा हमें ,
किस्मत से ज्यादा शायद ,
पा लिया था मैंने बहुत ।
कल रात तेरी यादो ने सताया बहुत ।
हिचकियाँ सारी रात आतीं रहीं ,
“राज ” को रुलाया बहुत ।

( फोटो -आभार गूगल )

Sunday, December 5, 2010

"क्या इन्हें भी पता चल गया मेरे जाने का ...? "



आजकल,
चिड़ियाँ भी कम नज़र आने लगी हैं ,
मेरी छत की मुंडेर पर ।
क्या इन्हें भी पता चल गया मेरे जाने का ?
चिड़ियों, तुम चिंता मत करना ।
मैंने , बहुत सारे "अनाज के दाने "..
लाकर रख दिये हैं ,
मेरी छत पर बने एक कमरे में ।
घर में सबको कह दिया है,
और अच्छे से सबको समझा भी दिया है ।
मेरे दोनों बच्चे सुबह और शाम ,
छत की मुंडेर पर "दाना" रख दिया करेगें ।
सब कुछ तुम्हारा ही तो है ।
इन "दानों" पर हक़ तुम्हारा है ।
मैं कहीं भी रहूँ ,
तुम कभी चिंता मत करना ।
मेरी छत पर रोजाना ,
इसी तरह आते रहना ।
अपने हिस्से का "दाना",
तुम इसी तरह चुगते रहना ।

Friday, December 3, 2010

"क्या जाना ज़रूरी है पापा ?"



कुछ दिनों से मैं ,
यह
महसूस कर रह हूँ।
बच्चे आजकल , कुछ कम खेलते हैं।
बस मेरे आगे-पीछे ही घुमते हैं ।
मुझसे कुछ कहना चाहते हैं
"क्या जाना ज़रूरी है पापा ?"
शायद , यह पूछना चाहते हैं।
खुल कर तो कह पाते नहीं,
सब कुछ मगर,
अपनी आखों से कह जाते हैं ।

(फोटो आभार : गूगल )

Thursday, December 2, 2010

"एक नये सफ़र की तैयारी है। "




"एक जोड़ी पुराने जूते हैं पास मेरे,
और एक नये सफ़र की तैयारी है।
मेरे जाने का जबसे पता चला है ,
घर में सबकी आखें भारी हैं
सबसे बड़ा बेटा हूँ घर का ,
अभी काम बहुत करने हैं
जीवन रुपी समुन्द्र में ,
सघन मंथन
के बाद ही ,
तो
अमृत कलश निकलने हैं "

Wednesday, December 1, 2010

"उस शहर में मेरे कुछ दोस्त भी रहते हैं ..."



ज़िन्दगी में बड़ों का आशीर्वाद ,
और सफ़र में घर का बना खाना ,
बहुत काम आता है ।
जब भी निकलता हूँ सफ़र के लिए,
आलू का परांठा और आम का अचार ,
बहुत याद आता है ।
तुम तो सब जानती हो माँ,
बस तुम्ही तो मुझे पहचानती हो माँ,
बेसन के लड्डू बहुत पसंद है मुझे,
इस बार का सफ़र कुछ लम्बा है,
हो सके तो थोड़ी सी मठरी भी बना देना।
इस बार लड्डुओं में ज़रा,
अपनी ममता की चाशनी और मिला देना।
मुझे पता है , आजकल तुम बीमार रहती हो...
घर का खाना भी ठीक से नहीं बना पाती हो।
चाहे लड्डू गोल से ना बने... मगर मैं खा लूँगा...
आपके हाथ से छूकर सारे के सारे लड्डू ,
अपने आप ही स्वादिष्ट हो जायेगें ।
बहुत दूर का है सफ़र,
रास्ते में मेरे बहुत काम आयेगें ।
और माँ , कुछ लड्डू और भी बना देना।
उस शहर में मेरे कुछ दोस्त भी रहते हैं ।
अपनी माँ से वह भी दूर रहते हैं ।
थोड़े उनके लिए भी ,
एक नये डिब्बे में रख देना ।
उनके घर जाकर खिला कर आऊँगा ।
सफ़र शुरू होने में ,
बस थोडा सा ही समय बाकी है ।
घर में सभी से ,
अभी बहुत कुछ कहना बाकी है ।
बच्चों को तो प्यार से समझा दूंगा,
बाकि जो कहना होगा,
चलते वक्त मेरी आखें कह देंगी ।

( शेष अगली कविता में....)

Sunday, November 28, 2010

"अगर, आज तुम ना आए तो......."



अगर, आज तुम ना आए तो.....
मेरी प्रतीक्षा के क्षण,
कण -कण करके टूट कर बिखर जायेंगे ।
शायद , फिर कभी समेट नहीं पाऊंगा
आंखों से बहते हुए ज़ज्बातों को ...
गुजरते हुए इंतज़ार के लम्हों को
अगर, आज तुम ना आए तो.....
ज़िन्दगी की बेरंग तस्वीर में ,
कोई रंग नहीं भर पाऊंगा ,
अगर, आज तुम ना आए तो.....
पहले भी जिया है ,
हर लम्हा , कई बार मर-मर के ......
इस तरह अब और ,
मै जी नहीं पाऊंगा ।
अगर, आज तुम ना आए तो.....

"आज दिल की सारी बातें कहने दो .."

"बातों का यह सिलसिला चलने दो ।
आज दिल की सारी बातें कहने दो ।
कह लेना तुम भी अपने दिल की बातें ,
वक्त थोडा ज़रा और गुजरने दो ।
पहली बार ज़िन्दगी में मिला कोई अपना ,
इस ख़ुशी में आज मुझे , जी भर के रोने दो । "

Friday, November 26, 2010

"जब भी आता है 26 नवम्बर, दिल के जख्म उभर आतें हैं"



जब भी आता है 26 नवम्बर ,
दिल के जख्म उभर आतें हैं ।
बिछुड़ गये जो हमसे,
वह सब बहुत याद आते हैं ।
ना जाने कब थमेगा,
इसी तरह बिछुड़ने का सिलसिला ,
पूछते है सब , यह एक-दूसरे से...
उत्तर मगर किसी से नहीं पाते हैं ।
जब भी आता है 26 नवम्बर ,
दिल के जख्म उभर आतें हैं ।
क्या जीयेगें इसी तरह ,
मर-मर के हम ज़िन्दगी ,
यही सोच कर , लोग सिहर जाते हैं ।
घर के चिराग जिनके बुझ गये,
हमारी ज़िन्दगी बचाने में,
चलो, आज हम सब मिलकर
उनके घर होकर आते हैं ।
देश पर मिटने वालों का घर,
होता है सच्चा मंदिर,
आज उनके घर पर जाकर ,
अपना शीश झुका कर आते हैं ।
जब भी आता है 26 नवम्बर ,
दिल के जख्म उभर आतें हैं ।

Wednesday, November 24, 2010

मेरी जिंदगी तूने मुझे , बहुत आजमाया है।



मेरी जिंदगी तूने मुझे , बहुत आजमाया है।
सिर्फ़ खोया ही है आज तक “राज ” ने ,
नही कुछ पाया है।
लौट गई खुशियाँ बीच राह में से ही,
मील के पत्थरों ने आंसुओं से भीगा हुआ ,
यह संदेशा भिजवाया है।
अब न कभी आयेंगीं बहारें ,
चमन की डालियों ने , सिसकते हुए यह बताया है ।
बरसात के मौसम में भी न बरसेंगें बादल,
तपती धरती ने हर बार की तरह ,
फिर अपने दिल को समझाया है ।
बर्फ कैसे गिरेगी मेरी घर की छत पर ,
आग के शोलों पर , जब हमने घर बनाया है ।
क्यों आ जाते हम हर किसी की बातों में ,
गैरों से ज्यादा हमें , अपनों ने रुलाया है।”

Monday, November 22, 2010

"चेहरे की उड़ी- उड़ी रंगत , कह रही है कहानी आपकी।"



चेहरे की उड़ी- उड़ी रंगत , कह रही है कहानी आपकी।
बहुत मजबूर, ग़मों से चूर लग रही है सूरत आपकी।
बोझिल पलकें बता रहीं हैं , कई रातों से नीदें अधूरी हैं आपकी।
चेहरे की उड़ी- उड़ी रंगत , कह रही है कहानी आपकी।
तितली की तरह उड़ना था आपको आकाश में
एक कमरे में सिमट कर रह गई है ज़िन्दगी आपकी।
कुछ ढूँढ रहीं है आपकी बैचेन निगाहें,
शायद कोई चीज खो गई है आपकी।
चेहरे की उड़ी- उड़ी रंगत , कह रही है कहानी आपकी।
टूट कर चकना चूर हो गई , दिल के कानिस पर
जो रखी थी ख्वाबों की तस्वीर आपकी।
कहने को तो मुस्करा रहें हैं आप, मगर सच कहते हैं हम।
पहले जैसी , वो मुस्कराहटें अब नहीं है आपकी।
चेहरे की उड़ी- उड़ी रंगत , कह रही है कहानी आपकी।

Saturday, November 20, 2010

"आसमान से टूटता हुआ तारा हूँ ...."



कोई किसी को याद नहीं करेगा ,
यह ग़लत कहते है लोग।

ज़िन्दगी भर याद आयेगें ,
मुझे आप सब लोग।

शायद मुझे भी याद करेंगे ,
मेरे जाने के बाद "कुछ" लोग।

जब खामोश हो जाऊंगा मै ,

तब गीत मेरे गुनगुनायेंगे लोग।

चला जाऊंगा इस शहर से जब मै,
मेरे कदमों के निशान ढूढेंगे लोग।

मैं हूँ एक पेड़ चंदन का,
इसलिए मेरे करीब नहीं आते है लोग।

पत्थर पर घिस कर, जब मिट जाऊंगा मै,
तब मुझे माथे पर लगायेंगे लोग।

आसमान से टूटता हुआ तारा हूँ,
एक दिन टूट जाऊंगा मै ।

खुशी बहुत है , इस बात की "राज" को मगर

देखकर मुझे, अपनी मुरादें पूरी कर लेंगे लोग।

Thursday, November 18, 2010

"ख़ुशी का "एक आंसू" बन जाऊँ मैं ..."



"किसी की पथरायी आँखों के लिए ,

ख़ुशी का "एक आंसू" बन जाऊँ मैं ।

चाहे अगले ही पल बह जाऊँ मैं ।

एक पल में कई ज़िन्दगी जी जाऊँ मैं ,

चाहे अगले ही पल फ़ना हो जाऊँ मैं

(फोटो आभार - गूगल)

"सिर्फ़ तुम पर, बस तुम पर ही लिखी हैं ....."



सिर्फ़ तुम पर, बस तुम पर ही लिखी हैं .....
सारी कवितायें मैंने ,
एक दिन सब तुमको ही सुनानी हैं।
कुछ कवितायें अधूरी रहीं,
कुछ कवितायें लिख ना सके।
कुछ कवितायें तुम सुन ना सके,
कुछ कवितायें हम सुना ना सके।
वक्त गुजर गया कुछ कवितायें कहने का,
कुछ कवितायें तुमको सुनाने का ,
अभी वक्त आया ही नहीं।
सिर्फ़ तुम पर, बस तुम पर ही लिखी हैं .....
सारी कवितायें मैंने ,
एक दिन सब तुमको ही सुनानी हैं।
कई कवितायें ,
अभी तुम पर लिखनी बाकी हैं।
कई अधूरी कवितायें
अभी पूरी करनी बाकी हैं।
हो जायेंगी एक दिन सब कवितायें पूरी ,
जीवन अनंत है आस है पूरी ।
इन्तजार लंबा है मगर, अनेकों जीवनकाल हैं।
तब तक, एक सर्वश्रेष्ठ कविता भी बन जायेगी।
सिर्फ़ तुम पर, बस तुम पर ही लिखी हैं .....
सारी कवितायें मैंने ,
एक दिन सब तुमको ही सुनानी हैं।

Tuesday, November 16, 2010

"मत सुनो आज कोई कविता मुझसे...."




मत सुनो आज कोई कविता मुझसे,
सिर्फ़ ख़ुद से ही बांतें करने दो

क्यों सुनाता हूँ मै कविता तुम्हें,
ख़ुद से आज पूछने दो

कभी- कभी लगता है,
प्रश्नों की किताब है ज़िन्दगी

जिंदगी के सारे प्रश्नों को ,
आज मुझसे हल करने दो,

ना जाने कैसी यह किताब है जिंदगी की ?
सारे प्रश्न हल भी ना हो पाते है,
कुछ नए प्रश्न हर बार जुड़ जाते हैं

कहाँ से आते है यह प्रश्न ,
किस्सा सारा आज मुझे समझने दो

मत सुनो आज कोई कविता मुझसे,
सिर्फ़ ख़ुद से ही बांतें करने दो

यहाँ छोटे प्रश्नों के उत्तर भी ,
पूरे विस्तार से लिखने होते हैं

खाली स्थान वाले प्रश्नों मै भी ,
सही शब्द ही भरने होते हैं

यूँ तो आने वाले नए प्रश्नों के भी ,
सारे उत्तर हैं मेरे पास
...
मगर पहले ,
अधूरे प्रश्नों को आज मुझे हल करने दो

मत सुनो आज कोई कविता मुझसे,
सिर्फ़ ख़ुद से ही बांतें करने दो ।

Sunday, November 14, 2010

क्योकिं बच्चे नहीं जानते, कि बच्चे क्या होते हैं ? (Happy Children Day)



"कभी कभी उसका स्कूल से देर से,
लौटना मुझे परेशान कर देता है।
ऑफिस के काम में नहीं लगता फिर मन मेरा,
स्कूल के फ़ोन मिलाने लगता हूँ।
सड़क पर आकर फिर बस की राह देखता हूँ।
क्योकिं बच्चे नहीं जानते, कि बच्चे क्या होते हैं ?
अपने वजन से ज्यादा भारी बैग अपने ,
नाजुक कन्धों पर लेकर जब वो बस से उतरता है
लपक कर वह बैग मैं , अपने हाथों में ले लेता हूँ।
क्योकिं बच्चे नहीं जानते, कि बच्चे क्या होते हैं ?
पानी की खाली बोतल , और भरा हुआ ...
लंच बॉक्स भी थमा देता है वो मेरे हाथों में।
फिर ऊँगली पकड़कर मेरी साथ-साथ बढता है
नन्हे-नन्हे पैरों से बड़े-बड़े कदम चलता है
खुश होता है वह कि मैं उसका साथ हूँ।
उससे ज्यादा खुशी मुझे होती है ,
कि वह मेरे साथ है।
क्योकिं बच्चे नहीं जानते, कि बच्चे क्या होते हैं ?
यूँ तो अब टॉफियाँ नहीं खाता हूँ मैं ,
खा लेता हूँ मगर, जब आधी तोड़ कर देता है वह,
क्योकिं बच्चे नहीं जानते, कि बच्चे क्या होते हैं ?
यूँ तो अपना होम-वर्क ख़ुद कर लेता है मगर,
"Math" में जरुरत मेरी महसूस करता है।
तब ऑफिस की लाखों की गुणा-भाग को छोड़कर,
"3" और "2" को जोड़ना अच्छा लगता है
क्योकिं बच्चे नहीं जानते, कि बच्चे क्या होते हैं ?"

Thursday, November 11, 2010

"किताब में रखे गुलाब के फूल और तितलियाँ याद आते बहुत है ।"




पुराने दोस्त याद आते बहुत है ,
तनहाइयों में रुलाते बहुत है .
राज" की जिंदगी की राहों में ,
मोड़ आते बहुत है .
किताब में रखे गुलाब के फूल
और तितलियाँ याद आते बहुत है
मै यहाँ ठीक हूँ , यह उनको है ख़बर ,
घर से दूर रहने पर मगर ,
हिचकियाँ आती बहुत है .
तनहाइयों में रुलाती बहुत है .
आंसुओं के समंदर में है , “राजकी जिंदगी
और लोग समझते है , हम मुस्कराते बहुत है "

"फोटो आभार : गूगल"

"मेरे सिरहाने आकर बैठ गए, तुम्हारी यादों के साये ..."

"कल रात हम सो नहीं पाये।
मेरे सिरहाने आकर बैठ गए,
तुम्हारी यादों के साये
यादों के बादल,
घिर-घिर के आये।
बीतें हुए लम्हों की,
चमकती रहीं बिजलियाँ।
दिल के आसमां पर,
तुम इन्द्रधनुष बन कर छाये।
कल रात हम सो नहीं पाये।
मेरे सिरहाने आकर बैठ गए,
तुम्हारी यादों के साये
अब इन आंसुओं को कौन समझाये ,
तुम जब याद आये,
बहुत याद आये।
कल रात हम सो नहीं पाये।
राह में हम क्या ठहरे
कुछ लम्हों के लिये,
तुम बहुत आगे चले आये।
फिर कभी हम-तुम ,
मिल नहीं पाये।
फिर भी कुछ अलग है
तुम में बात, मेरे दोस्त।
हम आज तक तुम्हें भूल नहीं पाये।
कल रात हम सो नहीं पाये।"

Monday, November 8, 2010

"मुझे याद है तुम्हारा पहला ख़त, जो तुमने मुझको लिखा था ..."




मुझे याद है तुम्हारा पहला ख़त,
जो
तुमने मुझको लिखा था
मुझे याद है तुम्हारा दूसरा ख़त,
जो
तुमने मुझको लिखा था।
इस तरह पाँच ख़त तुमने मुझको लिखे थे
सारे खतों में एक प्यारा सा अहसास था ,
सारे ख़त थे कोरे कागज ,
लिफाफे
पर बस मेरा नाम था
फिर छठे ख़त में तीन शब्द लिख पाये तुम
"क्या चाकलेट खाओगे" मेरे साथ तुम
वो पहली चाकलेट जो हमने आधी-आधी खायी थी
वो चाकलेट पचास पैसे की आयी थी
अपनी गुल्लक से जो तुम लाई थी
उस चाकलेट का रैपर मैंने रख लिया था
कई ख़त मैंने भी तुमको लिखे,
पर
सारे ख़त मेरे पास ही रहे
और वो आखरी ख़त ,
जो
तुमने मुझको लिखा था
इस बार कोरा कागज नहीं था वह ,
जीवन का उसमें था सार लिखा,
प्रेम
का सारा हाल लिखा।
ना मिल पायेगें हम,
यह
बार-बार लिखा

Tuesday, October 26, 2010

"जन्म-जन्मान्तर के रिश्ते है ..."

यूँ ही दिल को नहीं अच्छा लगता कोई ।
हर रोज सपनों में नहीं आता कोई ।
यूँ तो दुनिया में हजारों हैं लोग,
पर ज़िन्दगी का एक से ही जुड़ता है संजोग ।
जन्म-जन्मान्तर के रिश्ते है "राज"।
इन्हें तोड़ नहीं सकता कोई ।
"एक नज़र" के लिए तलाशते उम्रभर ,
उम्रभर के लिए फिर बस वही "एक प्यारी" सी नज़र ।
सिमट जाती है दुनिया,
याद नहीं रहता फिर कोई ।
जन्म-जन्मान्तर के रिश्ते है "राज"।
इन्हें तोड़ नहीं सकता कोई ।

रिश्ते पहले बन जाते हैं ,
जन्म हम बाद में पाते हैं ।
खुदा के बनाये इन रिश्तों को ,
कैसे ना माने कोई ।
एक मैं ही क्या ,
उम्रभर निभाता है हर कोई ।
जन्म-जन्मान्तर के रिश्ते है "राज"।
इन्हें तोड़ नहीं सकता कोई ।

Saturday, October 23, 2010

"चाँद कल रात का, वाकई बहुत ख़ास था।"



चाँद कल रात का, वाकई बहुत ख़ास था।
सांझ ढले से ही मुझको , बस उसका इंतज़ार था।
उससे मिलने की तमन्ना में, दिल बेकरार था।
आंसमा में चमक रहा, मानों आफताब था।
चाँद कल रात का, वाकई बहुत ख़ास था।
छत पर बैठ कर , बतियाँ की ढेर सारी।
आखों ही आखों में गुज़र गयी रात सारी
मेरे चाँद का , जुदा सबसे अंदाज़ था।
चाँद कल रात का, वाकई बहुत ख़ास था।
चंद लम्हों में ही, कई जन्मों का साथ था।
चांदनी में उसकी , अपनेपन का अहसास था।
बिछुड़ने के वक्त, आखों में बस मेरी ....
आंसुओं का ही "राज" था।
चाँद कल रात का, वाकई बहुत ख़ास था

फोटो - आभार गूगल

Wednesday, October 20, 2010

"गुनगुनी धूप का साथ, मन को बहुत भाने लगा है .."



राह में सूरज ,
कोहरे से अठखेलियाँ करने लगा है।
इसीलिए शायद,
मेरे शहर में , देर से आने लगा है
अब मुझे देर से जगाने लगा है
गुनगुनी धूप का साथ,
मन को बहुत भाने लगा है
आओ स्वागत करें हम सब मिलकर ,
जाड़ों का मौसम अब आने लगा है

(अपने गृह नगर - उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर से....)
शलभ गुप्ता
फोटो - आभार गूगल