Monday, June 14, 2010

"बारिशों के मौसम में भीगना, मुझे यूँ अच्छा लगता है।"



बारिशों के मौसम में भीगना,
मुझे यूँ अच्छा लगता है।
हम कितना भी रो लें,
किसी को क्या पता चलता है।
खुदा से पूछता हूँ बार-बार,
क्यों बनाये ये मौसम चार,
एक ही मौसम रहता बरसात का,
तो कितना अच्छा होता ।
मेरे आंसुओं का किसी को,
कभी पता ना चलता ।
मौसम के बदलने से,
बारिशें थम भी जाती हैं।
आंसू मगर अब, रुक नहीं पातें हैं।
आखों से लगातार बरसते जातें हैं।

3 comments:

  1. नमस्ते,

    आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

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  2. हम कितना भी रो लें,
    किसी को क्या पता चलता है।

    संवेदनशील रचना

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  3. वाह .. क्या बात लिखी है .. एक ही मौसम होता तो आँसू नज़र न आते ...

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