Wednesday, February 2, 2011

"मेरी आंखों में है समंदर ,किसी ने न जाना ...



टूटने से है अच्छा है बिखर जाना ।
ऐ-मेरे "दोस्त" अब मुझे ,
कभी महफिल में ना बुलाना ।
टूटे हुए टुकड़े, फिर आंखों में चुभते हैं ,
बहुत मुश्किल होता है फिर ,
आंसुओं को रोक पाना ।
“फ़रिश्ता ” बनकर तो, न जा सकेंगे;
बुरा बनकर हो जाएगा आसान,
सबके लिए फिर मुझे भूल जाना ।
टूटने से बेहतर है , बिखर जाना।
लहरों की भी हम कहाँ सुनते हैं ,
अपनी तो आदत है ,
तूफानों में कश्ती ले जाना ।
चाँद बेवजह ही खुश है ,
उधार की रौशनी पर ,
“सूरज” की तो आदत है ,
शाम होते घर जाना ।
मुस्कारते हुए लब तो देखे है सबने ,
मेरी आंखों में है समंदर ,किसी ने न जाना ।
टूटने से है अच्छा है बिखर जाना ।

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