Monday, September 18, 2017

"बड़े बेटे का खत.."

आत्मकथा के कुछ पन्नों पर, मैंने कुछ कवितायेँ भी लिखी हैं।  उन कविताओं में से, लगभग 10 वर्ष  पूर्व लिखी एक कविता, आपके लिए।  मुंबई की कई काव्य गोष्ठियों और मंचों पर इस कविता को मेरे द्वारा सुनाया भी गया।  अब तो, दोनों बेटे भी बड़े हो गए हैं। 
सूरत शहर की पावन धरती को भी  नमन करता हूँ, जहाँ रहकर मैं, इस  कविता का सृजन कर पाया।  
इस कविता का शीर्षक है "बड़े बेटे का खत" !

  











कल बड़े बेटे का ख़त मिला मुझे,
लगता है सचमुच बड़ा हो गया है।
लिखा है - छोटा भाई मेरा कहना मानने लगा है।
पहले आपकी उँगलियाँ पकड़कर चलते थे हम दोनों,
अब मेरी ऊँगली पकड़कर वो चलने लगा है।
आपके पीछे हम कम झगड़ते हैं , 
सारे बातें ख़ुद ही निबटातें हैं।
हमे मालूम है मम्मी हमारी,
शाम को किससे शिकायत करेगी ?
और यहाँ सब ठीक है मगर,
मम्मी कभी-कभी बहुत उदास हो जाती है।
यूँ तो हँसा देते हैं हम उनको मगर,
तकिये में चेहरा छिपा कर फिर वो सो जाती हैं।
जब कभी चाचू, दादा जी का कहना नहीं मानते हैं,
उस दिन आप, सबको बहुत याद आते हैं।
आप थे तो आँगन में रखे पौधे भी, 
हर मौसम में हरे भरे रहते थे।
आप नहीं तो इन बरसातों में भी, 
सारे फूल मुरझाये से रहते हैं।
वैसे तो आपकी "बाइक" चलाना सीख गया हूँ मगर,
भीड़ भरी सड़कों पर आप बहुत याद आते हैं।
स्कूल की फीस, ख़ुद जमा कर देता हूँ
"रिपोर्ट कार्ड" पर भी मम्मी साइन कर देतीं हैं मगर,
"पेरेंट्स मीटिंग्स" में आप बहुत याद आते हैं।
और पापा, कल तो गैस भी बुक कराई मैंने।
यूँ तो बिजली का बिल भी जमा कर सकता हूँ।
मगर, घर से ज्यादा दूर मम्मी भेजती नहीं हैं।
यूँ तो मम्मी हर चीज दिला देती हैं, 
कभी-कभी हम जिद कर जाते हैं।
और यहाँ सब ठीक है मगर ,
"डेरी मिल्क" अब कम खा पाते हैं।
अक्सर, देर रात फ़ोन आपका आता है ।
हम जल्दी सो जाते हैं, मम्मी सुबह बताती हैं।
कभी दिन में भी फ़ोन किया करो, 
बच्चों की बातें सुना करो।
अच्छा, यह लिखना पापा अब कब आओगे ?
दीपावली पर घर आ जाना ।
मम्मी जी को पटाखों से डर लगता है। 
पटाखे तो आप ही दिलाना।
दीपावली पर घर आ जाना ।

@ शलभ गुप्ता 


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