Sunday, September 12, 2010

"जब भी कभी तन्हा , महसूस करता हूँ मैं.....

अक्सर मैं यह महसूस करता हूँ, कि मेरी कवितायेँ ही मेरी सबसे प्यारी "दोस्त" हैं........
मेरे जीवन के हर खुशनुमा और ग़मगीन पलों में , हमेशा मेरे साथ रहती हैं....
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"जब भी कभी तन्हा महसूस करता हूँ मैं,
अपनी कविताओं से , खूब बातें करता हूँ मैं ।

बातों में, फिर तेरा ज़िक्र करता हूँ मैं .
ज़िक्र तेरा आते ही , मेरी कविताओ के
खामोश शब्द बोलने लगते हैं ,
फिर घंटों मुझसे , तेरी बातें करते हैं
मेरी कविताओं के शब्द तुमने ही तो रचे है
तुम्हारी ही तरह “शब्द” भावुक है ....
बातें मुझसे करते है , और नैनों से बरसते रहते है
जब भी कभी तन्हा , महसूस करता हूँ मैं
अपनी कविताओं से बातें करता हूँ मैं ।
अर्ध -विराम सहारा देतें है शब्दों को ,
मात्राएँ , शब्दों के सर पर हाथ रखती हैं ।
हिचकियाँ लेते शब्दों को पंक्तियाँ दिलासा देतीं है ।
फिर सिसकियाँ लेते हुए शब्दों को ,
मै सीने से लगाकर , बाहों में भर लेता हूँ,
शब्द मुझमे समां जाते है , मुझको रुला जाते है ।"

5 comments:

  1. बहुत कोमल से एहसासों को शब्द दिए हैं ...

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  2. बहुत सुन्दर एहसास |

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  3. बातों में, फिर तेरा ज़िक्र करता हूँ मैं .
    ज़िक्र तेरा आते ही , मेरी कविताओ के
    खामोश शब्द बोलने लगते हैं ...


    बहुत खूब .. सच है वो हैं तो कविताएँ हैं .... शब्द हैं ... बोलते हुवे ...

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  4. बहुत दिनों बाद इतनी बढ़िया कविता पड़ने को मिली.... गजब का लिखा है

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