Sunday, September 26, 2010

"यह रिश्ते हाथों से जाते रहेंगें.."

अभी भी समय है , संभाल लें
हम बिखरते हुये इन "रिश्तों" को ।
वर्ना , यह रिश्ते हाथों से जाते रहेंगें।
इस भागती - दौड़ती ज़िन्दगी में ,
कुछ पल तो "दूसरों" के लिये रखो दोस्तों ।
दिल खोल कर हँसों और खुल कर मिलो सबसे ।
संवेदनशील बनाओं अपनी भावनाओं को ,
वरना अपने भी पराये होते रहेगें,
यह रिश्ते हाथों से जाते रहेंगें।
सूरज अपना चक्र कम कर दे अगर,
यह दिन के उजाले भी जाते रहेगें।
चाँद जल्दी घर जाने लगे अगर,
सपने अधूरे हमारी आखों में ही रहेगें।
खुल कर ना बरसें बादल अगर,
धरा पर हम सब फिर प्यासे रहेगें।
अभी भी समय है , संभाल लें .
हम बिखरते हुये इन "रिश्तों" को ।
वरना अपने भी पराये होते रहेगें,
यह रिश्ते हाथों से जाते रहेंगें।

5 comments:

  1. क्या बात है बहुत ही सुन्दर संदेश दे रही है आपकी रचना। रिश्तों को बाँध के रखने का सबब याद दिला रही हैं। शुभकामनाएं।

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  2. @ NK Pandey ji :आजकल "प्लास्टिक" से अहसास हो गये हैं...... अपनों से बहुत दूर हो गये हैं.....

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  3. @ Sangeeta Swarup ji :प्रभु ने हमें मनुष्य रूप प्रदान किया है , यह हम सबका सौभाग्य है । बस "इंसान" बनना है । एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील बनना है ।

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  4. आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को मिलेंगी......आपको फॉलो कर रहा हूँ |

    कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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