Wednesday, November 24, 2010

मेरी जिंदगी तूने मुझे , बहुत आजमाया है।



मेरी जिंदगी तूने मुझे , बहुत आजमाया है।
सिर्फ़ खोया ही है आज तक “राज ” ने ,
नही कुछ पाया है।
लौट गई खुशियाँ बीच राह में से ही,
मील के पत्थरों ने आंसुओं से भीगा हुआ ,
यह संदेशा भिजवाया है।
अब न कभी आयेंगीं बहारें ,
चमन की डालियों ने , सिसकते हुए यह बताया है ।
बरसात के मौसम में भी न बरसेंगें बादल,
तपती धरती ने हर बार की तरह ,
फिर अपने दिल को समझाया है ।
बर्फ कैसे गिरेगी मेरी घर की छत पर ,
आग के शोलों पर , जब हमने घर बनाया है ।
क्यों आ जाते हम हर किसी की बातों में ,
गैरों से ज्यादा हमें , अपनों ने रुलाया है।”

3 comments:

  1. Ek Soch ...

    Tu vo Bandanawaz hain mere dost , tere ek anshu ne kai "Sholo" ko sard "Rakh" banaya
    Kabhi barf giregi , kabhi aag niklegi , kabhi barish hogi , kabhi chaman , kabhi khakh , sab badlenge ...
    Dekh teri aukat , tu nahin badla , insaan hain insaan raha , zindagi kya gujaregi tujhe , tu zindagi ko bula ke gujarta hain :)))

    Behtereen Shalabh Bhai Behtereen ..Jai Hind !!!!

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  2. @ संजय शर्मा जी (पुणे) : आप सब का साथ मुझे यहाँ तक ले आया है... बस मेरे शब्दों का यह सफ़र मेरी सांसें चलने तक चलता रहे....
    सच में, आप सब समझते हैं मुझे.... विवेक जी का मैं जीवन भर शुक्रगुज़ार रहूँगा....

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  3. kya keh diya mausa ji is choti si kavita mein........ rula diya is kavita ne.............Zindagi khol ke rakh di in char lines mein.........Bahut Khub

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